जलडमरूमध्य समुद्र का वह संकरा रास्ता होता है जो दो बड़े जल क्षेत्रों जैसे समुद्र, खाड़ी या महासागर को जोड़ता है। अंग्रेज़ी में इसे Strait कहा जाता है। हिंदी का शब्द “जल-डमरू-मध्य” दरअसल इसकी आकृति से जुड़ा है। डमरू जैसा आकार दो तरफ़ चौड़ा और बीच में संकरा इसकी खास पहचान है। इसी संकरे समुद्री मार्ग से जहाज़ एक जल क्षेत्र से दूसरे जल क्षेत्र में जाते हैं। इसलिए यह रास्ता व्यापार और समुद्री परिवहन के लिए बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है।
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य क्यों है इतना अहम?
हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पश्चिम एशिया में स्थित एक बेहद रणनीतिक समुद्री रास्ता है। यह फ़ारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी से जोड़ता है। फ़ारस की खाड़ी के किनारे कई बड़े तेल उत्पादक देश स्थित हैं, इसलिए दुनिया का बहुत बड़ा तेल इसी रास्ते से जहाज़ों द्वारा बाहर जाता है। अगर यह मार्ग बंद हो जाए तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर सीधा असर पड़ सकता है। इसी कारण दुनिया भर की नज़रें अक्सर इस जलडमरूमध्य पर टिकी रहती हैं।
भारत के पास भी है एक जलडमरूमध्य
भारत के पास भी एक जलडमरूमध्य है जिसे पाक जलडमरूमध्य कहा जाता है। यह तमिलनाडु और श्रीलंका के बीच स्थित है। एक तरफ बंगाल की खाड़ी का हिस्सा पाक खाड़ी है और दूसरी ओर मन्नार की खाड़ी। हालांकि इसकी चौड़ाई कई जगहों पर 60 से 130 किलोमीटर तक है, लेकिन गहराई कम होने और बीच में चट्टानों व टापुओं की श्रृंखला जिसे रामसेतु कहा जाता है, के कारण बड़े समुद्री जहाज़ यहां से नहीं गुजर पाते है। इसलिए यह मार्ग मुख्य रूप से स्थानीय नावों और मछुआरों के उपयोग में आता है।
पारसी समुदाय से जुड़ा हॉर्मुज़ का इतिहास
हॉर्मुज़ नाम का संबंध प्राचीन फ़ारस के इतिहास से भी जुड़ा माना जाता है। कभी यहां एक बड़ा व्यापारिक बंदरगाह शहर हुआ करता था, जहां से मसाले, रेशम और अन्य वस्तुओं का अंतरराष्ट्रीय व्यापार होता था। इतिहासकारों के अनुसार 7वीं सदी में अरबों के फ़ारस पर कब्ज़े के बाद कई पारसी अपने धर्म की रक्षा के लिए इस क्षेत्र से समुद्री रास्ते भारत आए। माना जाता है कि हॉर्मुज़ उनका अंतिम पड़ाव था, जहां से वे जहाज़ों के ज़रिए भारत पहुंचे। आज भारत का पारसी समुदाय उसी ऐतिहासिक यात्रा की विरासत माना जाता है।