मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव और ईरान से जुड़े युद्ध के बाद फिर यह सवाल उठने लगा है कि भारत के पास तेल का कितना भंडार है। ऐसे समय में ऊर्जा सुरक्षा बहुत अहम हो जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर युद्ध लंबा खिंच जाए या सप्लाई रुक जाए तो देशों के लिए अपने भंडार ही सबसे बड़ी ताकत बनते हैं। इसलिए भारत की तेल भंडारण क्षमता पर चर्चा तेज हो गई है।
1991 के संकट की याद
यह चर्चा इसलिए भी हो रही है क्योंकि 1991 में जब खाड़ी युद्ध हुआ था तब भारत गंभीर आर्थिक संकट में फंस गया था। उस समय खबरें आई थीं कि देश के पास बहुत कम दिनों का ही तेल स्टॉक बचा था। साथ ही विदेशी मुद्रा भंडार भी तेजी से खत्म हो रहा था। मतलब अगर तेल आयात करना पड़ता तो डॉलर की भारी कमी हो सकती थी।
तब सरकार के पास अलग भंडार नहीं था
उस दौर में भारत के पास सरकार का अलग तेल भंडार नहीं था। तेल कंपनियों के पास जो स्टॉक होता था वही देश की जरूरत पूरी करता था। हालांकि ये कंपनियां सरकारी नियंत्रण में थीं, लेकिन आपात स्थिति के लिए अलग से कोई रणनीतिक भंडार मौजूद नहीं था। इस वजह से संकट के समय स्थिति और ज्यादा गंभीर हो सकती थी।
यहीं से शुरू हुई नई सोच
1991 के संकट के बाद यह समझ आया कि भारत को भी आपातकाल के लिए अलग तेल भंडार बनाना चाहिए। दुनिया के कई देशों ने पहले से ही ऐसे भंडार बना रखे थे। इन्हें स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिज़र्व यानी रणनीतिक तेल भंडार कहा जाता है। इसका इस्तेमाल सिर्फ तब किया जाता है जब देश में तेल सप्लाई पूरी तरह प्रभावित हो जाए।