सनातन परंपरा में खरमास को बेहद विशेष लेकिन अशुभ माना जाने वाला समय बताया गया है। यह अवधि लगभग एक महीने की होती है और साल में दो बार आती है। मान्यता है कि जब सूर्य देव गुरु बृहस्पति की राशियों धनु या मीन में प्रवेश करते हैं, तब खरमास लगता है। इस दौरान सूर्य का प्रभाव कमजोर माना जाता है और शुभ कार्यों के लिए ग्रहों की अनुकूलता नहीं रहती। इसी कारण इस समय विवाह, गृह प्रवेश या अन्य मांगलिक कार्यों को टाल दिया जाता है। हालांकि आध्यात्मिक साधना, दान और पूजा-पाठ के लिए यह समय अत्यंत फलदायी माना जाता है।
2026 में दूसरा खरमास कब से कब तक
पंचांग के अनुसार पहला खरमास दिसंबर 2025 में शुरू होकर जनवरी 2026 में समाप्त हो चुका है। अब साल 2026 का दूसरा खरमास 14 मार्च से शुरू होगा और 13 अप्रैल तक रहेगा। इस अवधि में सूर्य देव मीन राशि में गोचर करेंगे। पूरे एक महीने तक मांगलिक कार्यों से दूरी बनाने की परंपरा निभाई जाती है। लोग इस समय धार्मिक साधना, जप-तप, दान और सेवा जैसे कार्यों में अधिक ध्यान देते हैं। ज्योतिष मान्यताओं के अनुसार यह समय बाहरी भौतिक गतिविधियों की बजाय आंतरिक शुद्धि और आत्मिक उन्नति के लिए उपयुक्त माना जाता है।
खरमास को अशुभ क्यों माना जाता है
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार सूर्य और गुरु दोनों का शुभ प्रभाव मांगलिक कार्यों में महत्वपूर्ण माना जाता है। लेकिन जब सूर्य गुरु की राशियों में प्रवेश करता है, तब गुरु का प्रभाव कमजोर माना जाता है। ग्रहों की यह स्थिति शुभ कार्यों के लिए अनुकूल नहीं मानी जाती। इसलिए विवाह, गृह प्रवेश, नया व्यवसाय शुरू करना या बड़े फैसले लेना इस अवधि में टाल दिए जाते हैं। मान्यता है कि इस समय किए गए कार्यों का फल अपेक्षित नहीं मिलता। हालांकि धार्मिक दृष्टि से यह समय संयम, साधना और आत्मचिंतन का अवसर माना जाता है।
पौराणिक कथा और परंपरागत मान्यता
खरमास से जुड़ी एक पौराणिक कथा भी प्रचलित है। मान्यता है कि सूर्य देव सात घोड़ों के रथ पर ब्रह्मांड की परिक्रमा करते हैं। एक बार घोड़े थक गए, तो उनकी जगह गधों को जोड़ा गया, जिनकी गति धीमी थी। इससे सूर्य की चाल धीमी हो गई और यही समय खरमास कहलाया। इसके अलावा यह भी माना जाता है कि गुरु विवाह और शुभ कार्यों के कारक ग्रह हैं, और उनके प्रभाव में कमी होने से मांगलिक कार्यों से दूरी रखी जाती है। इसलिए खरमास को संयम, भक्ति और आध्यात्मिक साधना का काल माना गया है।