सनातन धर्म में होली से एक दिन पहले होने वाला होलिका दहन बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। यह पर्व बुराई पर अच्छाई की जीत का प्रतीक है और इसे सही मुहूर्त में करना जरूरी माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार होलिका दहन करते समय भद्रा काल का विशेष ध्यान रखा जाता है। इस साल पंचांग के अनुसार भद्रा काल 3 मार्च को सुबह 1 बजकर 25 मिनट से 4 बजकर 30 मिनट तक रहेगा। इसलिए भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करना शुभ माना जाएगा। मान्यता है कि शुभ समय में किया गया दहन ही सकारात्मक ऊर्जा और मंगल फल देता है।
भद्रा काल क्या होता है
ज्योतिष शास्त्र में भद्रा को अशुभ समय माना गया है। यह समय चंद्रमा की विशेष स्थिति के कारण बनता है और इसे उग्र प्रभाव वाला काल कहा जाता है। मान्यता है कि इस दौरान किए गए मांगलिक कार्यों में बाधाएं आती हैं या अपेक्षित फल नहीं मिलता। इसी कारण विवाह, पूजा, गृह प्रवेश या कोई भी शुभ कार्य भद्रा में टालने की सलाह दी जाती है। धार्मिक परंपराओं में भद्रा को सावधानी और संयम का समय माना गया है।
भद्रा में होलिका दहन क्यों वर्जित
धार्मिक मान्यता के अनुसार भद्रा का स्वभाव उग्र माना जाता है, इसलिए इस दौरान किए गए शुभ कार्यों का परिणाम अच्छा नहीं माना जाता। पौराणिक कथा के अनुसार होलिका दहन शुभ मुहूर्त में हुआ था, इसलिए आज भी उसी परंपरा का पालन किया जाता है। अगर भद्रा में होलिका दहन किया जाए तो घर में अशांति, विवाद या आर्थिक परेशानी की आशंका मानी जाती है। यही वजह है कि पंडित और ज्योतिषाचार्य हमेशा भद्रा समाप्त होने के बाद ही होलिका दहन करने की सलाह देते हैं।
भद्रा में क्या करें और महत्व
भद्रा काल में होलिका दहन नहीं करना चाहिए, लेकिन पूजा की तैयारी की जा सकती है। इस समय भगवान का स्मरण, मंत्र जाप और घर में सकारात्मक ऊर्जा बनाए रखने के उपाय करना शुभ माना जाता है। भद्रा समाप्त होते ही विधि-विधान से होलिका पूजन और दहन करना चाहिए। होलिका दहन की कथा हमें सिखाती है कि सत्य, श्रद्धा और भक्ति की हमेशा जीत होती है। सही समय पर किया गया होलिका दहन घर-परिवार में सुख, समृद्धि और शांति लाने वाला माना जाता है।