Holi Special 2026: रंगों नहीं राख से खेली जाती है होली, यहां जानिए काशी की मसान होली का रहस्य, परंपरा और आध्यात्मिक महत्व

होली का त्योहार रंगों, गुलाल और खुशियों से जुड़ा होता है, लेकिन एक जगह ऐसी भी है जहां रंग नहीं बल्कि चिता की राख से होली खेली जाती है. इसे मसान होली कहा जाता है. यह अनोखी परंपरा सदियों से चली आ रही है और इसे देखने के लिए दूर-दूर से लोग आते हैं. यहां होली सिर्फ उत्सव नहीं बल्कि जीवन और मृत्यु के सत्य को स्वीकार करने का प्रतीक भी है. यह परंपरा लोगों को आध्यात्मिक अनुभव कराती है और होली के अर्थ को एक अलग ही नजरिए से समझाती है.

कब और कहां मनाई जाती है

यह खास होली मणिकर्णिका घाट पर मनाई जाती है, जो वाराणसी में स्थित है. यहां रंगभरी एकादशी के बाद मसान होली खेली जाती है. पूरे देश में रंगों वाली होली से पहले काशी में यह अनोखा दृश्य देखने को मिलता है. परंपरा के अनुसार, इस दिन श्मशान घाट उत्सव का केंद्र बन जाता है और वातावरण पूरी तरह भक्ति और रहस्य से भर जाता है.

श्मशान में कैसे खेली जाती है होली

आमतौर पर श्मशान का नाम सुनकर डर या उदासी का भाव आता है, लेकिन यहां माहौल बिल्कुल अलग होता है. मसान होली खासतौर पर हरिश्चंद्र घाट और आसपास के श्मशान घाटों पर भी देखी जाती है. अघोरी, साधु-संत और शिव भक्त चिता की भस्म शरीर पर लगाकर और हवा में उड़ाकर होली खेलते हैं. ढोल-नगाड़ों की आवाज, तांडव की झलक और भक्ति के जयकारे इस आयोजन को अद्भुत बना देते हैं.

भगवान शिव से जुड़ा आध्यात्मिक संबंध

मसान होली का गहरा संबंध भगवान शिव से माना जाता है. उन्हें श्मशानवासी और भस्म प्रिय देव कहा जाता है. मान्यता है कि काशी में उनका विशेष निवास है और यहां मृत्यु भी मोक्ष का मार्ग मानी जाती है. इसलिए यहां मृत्यु को दुख नहीं, बल्कि जीवन के एक सत्य के रूप में स्वीकार किया जाता है. मसान होली इसी भावना को दर्शाती है.

कैसे शुरू हुई यह परंपरा

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, जब भगवान शिव विवाह के बाद पहली बार काशी आए, तो लोगों ने उनका स्वागत उत्सव और रंगों से किया. लेकिन उनके कुछ प्रिय गण इस उत्सव से दूर रह गए. तब शिव ने श्मशान में अपने गणों के साथ भस्म से होली खेली. तभी से यह परंपरा शुरू हुई मानी जाती है. यह कथा आज भी श्रद्धा के साथ सुनाई और निभाई जाती है.

मसान होली का गहरा महत्व

मसान होली सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन दर्शन है. यह हमें बताती है कि जीवन और मृत्यु अलग नहीं, बल्कि एक ही चक्र का हिस्सा हैं. जहां बाकी जगह रंगों से होली खेली जाती है, वहीं काशी में राख से होली खेलकर वैराग्य और सादगी का संदेश दिया जाता है. यह परंपरा हमें अस्थायी जीवन और स्थायी सत्य को समझने की सीख देती है.

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Author: The Hindi Post