होली हिंदू धर्म का बेहद पावन और उल्लास से भरा त्योहार है। फाल्गुन पूर्णिमा को होलिका दहन होता है और अगले दिन रंगों की होली खेली जाती है। लेकिन होली से पहले आने वाले आठ दिन बेहद महत्वपूर्ण माने जाते हैं, जिन्हें होलाष्टक कहा जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार इस समय शुभ और मांगलिक कार्य नहीं किए जाते। शादी-विवाह, गृह प्रवेश या नया काम शुरू करना वर्जित माना जाता है। माना जाता है कि इन दिनों ग्रहों की स्थिति उग्र रहती है, जिससे किए गए शुभ कार्यों का अच्छा फल नहीं मिलता। लेकिन सिर्फ होलाष्टक ही नहीं, हिंदू धर्म में सालभर में कई अन्य ऐसे समय भी आते हैं जब शुभ कार्य रोक दिए जाते हैं।
खरमास और चातुर्मास का समय
जब सूर्य देव धनु या मीन राशि में प्रवेश करते हैं तो खरमास लगता है, जो लगभग एक महीने तक चलता है। इसे अशुभ काल माना जाता है, इसलिए विवाह, गृह प्रवेश या अन्य मांगलिक कार्य टाल दिए जाते हैं। इसके अलावा चातुर्मास भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। आषाढ़ शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी से कार्तिक शुक्ल पक्ष की देवउठनी एकादशी तक चार महीने चातुर्मास रहता है। मान्यता है कि इस दौरान भगवान विष्णु योगनिद्रा में चले जाते हैं और सृष्टि का संचालन भगवान शिव करते हैं। इसलिए इस अवधि में भी शुभ कार्यों से परहेज किया जाता है।
पितृपक्ष का श्राद्ध काल
भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक 16 दिनों की अवधि को पितृपक्ष या श्राद्धपक्ष कहा जाता है। यह समय पूर्वजों के सम्मान और तर्पण के लिए समर्पित होता है। इन दिनों में लोग पिंडदान, श्राद्ध और तर्पण करते हैं। मान्यता है कि इस अवधि में नए काम शुरू करना, शादी करना या खरीदारी करना उचित नहीं होता। यह समय केवल पितरों की स्मृति और पूजा के लिए माना जाता है, इसलिए सांसारिक उत्सवों से दूरी रखी जाती है।
ग्रहण और पंचक का प्रभाव
सूर्य ग्रहण और चंद्र ग्रहण भी अशुभ समय माने जाते हैं। ग्रहण से पहले सूतक काल शुरू हो जाता है, जिसमें शुभ कार्य करना वर्जित होता है। चंद्र ग्रहण से लगभग 9 घंटे पहले और सूर्य ग्रहण से 12 घंटे पहले सूतक लग जाता है। इसके अलावा पंचक भी पांच दिनों की विशेष अवधि होती है, जब चंद्रमा कुछ खास नक्षत्रों में गोचर करता है। इस दौरान भी विवाह, निर्माण या अन्य मांगलिक कार्य करने से बचने की सलाह दी जाती है। मान्यता है कि इन समयों में किए गए काम बाधा या परेशानी ला सकते हैं।