हर साल फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पावन पर्व मनाया जाता है। यह दिन भगवान शिव और माता पार्वती के दिव्य मिलन का प्रतीक माना जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इसी दिन शिव और शक्ति का विवाह हुआ था। इसलिए इस दिन विशेष पूजा, व्रत और रात्रि जागरण का महत्व बहुत अधिक माना गया है। श्रद्धालु मानते हैं कि इस दिन सच्चे मन से पूजा करने पर जीवन की बाधाएं दूर होती हैं और वैवाहिक सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद मिलता है।
पार्वती ने लिए 108 जन्म
पुराणों के अनुसार, माता पार्वती को शिव जी को पति रूप में पाने के लिए 108 बार जन्म लेना पड़ा। अपने पहले जन्म में वह प्रजापति दक्ष की पुत्री के रूप में जन्मीं। उस जन्म में भी उन्होंने प्रेमपूर्वक शिव को पति चुना, लेकिन उनके पिता इस विवाह से संतुष्ट नहीं थे। उन्होंने अपनी बेटी का विवाह किसी और से करने की इच्छा जताई, पर पार्वती ने अपने निर्णय पर अडिग रहते हुए शिव भक्ति नहीं छोड़ी। यही अटूट समर्पण आगे चलकर उनकी तपस्या और पुनर्जन्मों का कारण बना।
अपमान और त्याग की कथा
पौराणिक कथा के अनुसार, दक्ष चाहते थे कि उनकी पुत्री का विवाह भगवान विष्णु से हो, लेकिन पार्वती ने शिव को ही अपना सबकुछ माना। इससे क्रोधित होकर दक्ष ने एक भव्य यज्ञ कराया, जिसमें शिव को आमंत्रित नहीं किया। जब पार्वती वहां पहुंचीं तो उन्होंने अपने पति का अपमान देखा और अत्यंत दुखी होकर अग्निकुंड में अपने प्राण त्याग दिए। यह समाचार मिलने पर शिव क्रोधित हो उठे और अपने जटाओं से वीरभद्र को प्रकट कर दक्ष का वध करा दिया। इसके बाद शिव लंबे समय तक विरक्त और शोक में डूबे रहे।
तपस्या से पूरा हुआ दिव्य मिलन
समय बीतने के बाद पार्वती ने हिमालय के घर पुनर्जन्म लिया। यही उनका 108वां जन्म था। इस जन्म में देवर्षि नारद ने उन्हें शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या करने की सलाह दी। पार्वती ने वर्षों तक कठिन साधना की, जिससे प्रसन्न होकर शिव ने उन्हें पत्नी रूप में स्वीकार किया। अंततः फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी के दिन दोनों का दिव्य विवाह हुआ, जिसे आज महाशिवरात्रि के रूप में पूरे श्रद्धा भाव से मनाया जाता है।