कैट्स ऑय, जिसे हिंदी में लहसुनिया कहा जाता है, वैदिक ज्योतिष में केतु ग्रह से जुड़ा बेहद शक्तिशाली रत्न माना जाता है। केतु वैराग्य, आध्यात्म, इन्टूशन, पिछले जन्मों के कर्म और अचानक घटनाओं का प्रतीक है। लहसुनिया को आम रत्नों की तरह भौतिक सुख बढ़ाने वाला नहीं माना जाता, बल्कि यह सुरक्षा, चेतना और कर्मिक प्रभावों से जुड़ा होता है। इसे खासतौर पर अनदेखे खतरों, रहस्यमय परेशानियों और अचानक होने वाले नुकसान से बचाव के लिए पहना जाता है।
केतु और रत्न का असर
ज्योतिष के अनुसार, जब कुंडली में केतु कमजोर या पीड़ित हो, तो व्यक्ति को भ्रम, डर, दिशा की कमी, दुर्घटनाएं या बिना वजह स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। ऐसे में लहसुनिया केतु की ऊर्जा को संतुलित करने में मदद कर सकता है। यह इन्टूशन को तेज करता है और बार-बार दोहराए जा रहे कर्मिक चक्रों से बाहर निकलने में सहायक माना जाता है। हालांकि, अगर केतु अशुभ हो तो यह रत्न नुकसान भी बढ़ा सकता है, इसलिए इसे बिना सलाह नहीं पहनना चाहिए।
असली लहसुनिया पहचानें
लहसुनिया क्राइसोबेरिल परिवार का रत्न है, जिसकी पहचान उसकी सतह पर दिखने वाली चमकदार चलती रेखा से होती है, जो बिल्ली की आंख जैसी दिखती है। इसका रंग शहद जैसा पीला, हरा-पीला या भूरा हो सकता है। अच्छा लहसुनिया वही माना जाता है जिसमें रेखा साफ, बीच में, लगातार और तेज हो। जिन पत्थरों में दरार, धुंधली रेखा या फीकी चमक हो, उन्हें पहनने की सलाह नहीं दी जाती। आमतौर पर 4 से 7 रत्ती तक का लहसुनिया पहनाया जाता है।
पहनने की विधि और सावधानी
लहसुनिया को चांदी या पंचधातु में, दाहिने हाथ की मध्य उंगली या अनामिका में पहना जाता है। इसे मंगलवार या गुरुवार शाम, केतु काल में धारण करने की परंपरा है। मंत्र “ॐ स्रां स्रीं स्रौं सः केतवे नमः” का 108 बार जाप किया जाता है। सबसे जरूरी बात यह है कि लहसुनिया हमेशा 57 दिन का ट्रायल पहनकर ही अपनाएं। डर, अलगाव या स्वास्थ्य समस्या बढ़े तो तुरंत उतार दें। यह रत्न फैशन नहीं, बल्कि कर्मिक और आध्यात्मिक साधन है, इसलिए अनुभवी ज्योतिषीय सलाह बेहद जरूरी है।