Indore में गंदे पानी से मौतों का सच, टेंडर फाइलों में दबी रही जिम्मेदारी, अधिकारियों की देरी बनी जानलेवा

इंदौर के भागीरथपुरा मोहल्ले में दूषित पानी से फैली बीमारी और मौतों ने नगर निगम की गंभीर लापरवाही उजागर कर दी है। जांच में सामने आया कि जिस नर्मदा पाइपलाइन में महीनों से ड्रेनेज का पानी मिल रहा था, उसे समय रहते बदला जा सकता था। लेकिन जिम्मेदार अधिकारियों ने जरूरी प्रक्रिया पूरी नहीं की। इसका खामियाजा आम नागरिकों को अपनी सेहत और जान गंवाकर भुगतना पड़ा। स्थानीय लोग लंबे समय से गंदे पानी की शिकायत कर रहे थे, लेकिन उनकी आवाज अनसुनी होती रही।

टेंडर में 100 दिन की देरी

भागीरथपुरा इलाके की पाइपलाइन बदलने के लिए 8 अगस्त को 2.40 करोड़ रुपये का टेंडर जारी हुआ था। टेंडर खरीदने की आखिरी तारीख 15 सितंबर तय थी और 17 सितंबर को इसे खोला जाना था। सात कंपनियों ने समय पर टेंडर भरे, जिनमें से एक तकनीकी कारणों से रिजेक्ट हुआ। हैरानी की बात यह रही कि तय तारीख पर टेंडर खोलने के बजाय फाइल को 100 से ज्यादा दिनों तक दबाकर रखा गया। आखिरकार 29 दिसंबर को टेंडर खोला गया, जब तक हालात बेहद गंभीर हो चुके थे।

अफसरों की भूमिका पर सवाल

इस देरी के पीछे नगर निगम के वरिष्ठ अधिकारियों की भूमिका पर गंभीर सवाल उठे हैं। आरोप है कि निगमायुक्त दिलीप कुमार यादव और अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया ने समय पर टेंडर खोलने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई। अगर प्रक्रिया समय पर पूरी हो जाती, तो पाइपलाइन बदली जा चुकी होती और ड्रेनेज का पानी नर्मदा जल में नहीं मिलता। स्थानीय लोगों का कहना है कि अधिकारियों की उदासीनता और टालमटोल ने हालात को जानलेवा बना दिया।

सीएम सख्त, बड़े फैसले

मामला सामने आने के बाद नगर निगम ने शुरुआत में केवल निचले कर्मचारियों पर कार्रवाई की, लेकिन बाद में सरकार सख्त हुई। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने दूषित पानी सप्लाई के मामले में बड़ा एक्शन लेते हुए अपर आयुक्त को इंदौर से हटाने के निर्देश दिए। साथ ही जल वितरण विभाग का प्रभार भी बदला गया। सीएम ने निगम आयुक्त और अपर आयुक्त को कारण बताओ नोटिस जारी करने के आदेश दिए हैं। इसके अलावा आकाश सिंह, प्रखर सिंह और आशीष कुमार पाठक को इंदौर नगर निगम का नया अपर आयुक्त नियुक्त किया गया है। प्रशासनिक स्तर पर अब जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया तेज हो गई है।

Rishabh Chhabra
Author: Rishabh Chhabra