इंदौर शहर में दूषित पानी पीने से हुई मौतों के मामले में एक बड़ा और गंभीर खुलासा सामने आया है। जांच में पता चला है कि भागीरथपुर क्षेत्र के लोग पिछले करीब छह महीनों से गंदा और दूषित पानी पीने को मजबूर थे। इस दौरान स्थानीय निवासियों ने कई बार इंदौर नगर निगम के अधिकारियों और मुख्यमंत्री हेल्पलाइन पर शिकायतें दर्ज कराईं, लेकिन हर बार उनकी शिकायतों को नजरअंदाज कर दिया गया। लगातार दूषित पानी की सप्लाई के कारण कई लोग बीमार पड़े और अब तक आठ लोगों की जान जा चुकी है, जिससे इलाके में दहशत का माहौल है।
मेयर के आदेश के बावजूद नहीं बदली पाइपलाइन
खुलासे में यह भी सामने आया है कि करीब छह महीने पहले इंदौर के मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने क्षेत्र में जर्जर और क्षतिग्रस्त पाइपलाइन बदलने के लिए टेंडर जारी करने के निर्देश दिए थे। इसके बावजूद हैरानी की बात यह है कि ये टेंडर अब तक स्वीकृत नहीं हो सके। बताया जा रहा है कि नगर निगम के भीतर की लापरवाही और कथित भ्रष्टाचार के कारण टेंडर प्रक्रिया को जानबूझकर लंबित रखा गया। यदि समय पर पाइपलाइन बदली जाती, तो लोगों की जान बचाई जा सकती थी।
भ्रष्टाचार के आरोप और जांच के आदेश
सूत्रों के अनुसार, नगर निगम के कुछ अधिकारी पाइपलाइन टेंडर में बड़े स्तर पर भ्रष्टाचार करना चाहते थे, इसी वजह से किसी भी ठेकेदार को काम नहीं सौंपा गया। टेंडर महीनों तक फाइलों में दबे रहे और आम लोग गंदा पानी पीते रहे। मामला उजागर होने के बाद मेयर पुष्यमित्र भार्गव ने नगर निगम आयुक्त को पूरे प्रकरण की जांच के आदेश दिए हैं। उन्होंने यह जानने को कहा है कि जब टेंडर समय पर जारी हुए थे, तो उन्हें मंजूरी क्यों नहीं मिली और जिम्मेदार अधिकारियों ने कार्रवाई क्यों नहीं की।
NHRC का संज्ञान और प्रशासन पर दबाव
मामले की गंभीरता को देखते हुए राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने स्वतः संज्ञान लिया है। आयोग के मुताबिक, भागीरथपुरा इलाके में दूषित पानी पीने से सात लोगों की मौत और 40 से ज्यादा लोगों के बीमार होने की पुष्टि हुई है। आयोग ने इसे मानवाधिकारों के उल्लंघन का मामला मानते हुए मध्य प्रदेश के मुख्य सचिव को नोटिस जारी किया है और दो हफ्ते में विस्तृत रिपोर्ट मांगी है। जांच में यह भी सामने आया कि मुख्य पानी की पाइपलाइन एक सार्वजनिक शौचालय के नीचे से गुजरती है और लीकेज के कारण सीवेज का पानी पीने के पानी में मिल रहा था। अब सभी की नजर इस बात पर है कि दोषियों पर क्या कार्रवाई होती है और भविष्य में ऐसी लापरवाही को रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जाते हैं।