आज के डिजिटल दौर में मोबाइल हमारी जिंदगी का सबसे करीबी साथी बन चुका है। सुबह आंख खुलते ही स्क्रीन देखना और रात को सोते वक्त आखिरी नजर मोबाइल पर डालना अब आम आदत बन गई है। सोशल मीडिया, वीडियो और ऑनलाइन गेम्स ने समय का पता ही नहीं चलने दिया। लेकिन यही आदत धीरे-धीरे हमारे शरीर को नुकसान पहुंचा रही है। लंबे समय तक मोबाइल देखने से गर्दन, कमर और कंधों पर दबाव बढ़ता है। खास बात यह है कि शुरुआत में दर्द हल्का लगता है, लेकिन समय के साथ यह गंभीर समस्या का रूप ले सकता है। इसे ही एक्सपर्ट ‘साइलेंट हेल्थ क्राइसिस’ मानते हैं।
रीढ़ और कमर पर सीधा असर
मोबाइल फोन झुककर देखने से रीढ़ की हड्डी पर सामान्य से कई गुना ज्यादा दबाव पड़ता है। इस स्थिति को ‘टेक नेक’ या ‘स्मार्टफोन सिंड्रोम’ कहा जाता है। लंबे समय तक गलत मुद्रा में बैठने से मांसपेशियों में खिंचाव, गर्दन जकड़न और कमर दर्द होने लगता है। यही स्थिति आगे चलकर स्पॉन्डिलाइटिस जैसी बीमारी को जन्म दे सकती है। खासतौर पर युवा वर्ग और स्टूडेंट्स, जो घंटों मोबाइल पर समय बिताते हैं, इस खतरे की चपेट में ज्यादा हैं। अगर समय रहते सावधानी न बरती जाए, तो यह समस्या रोजमर्रा की जिंदगी को प्रभावित कर सकती है।
आंखों और दिमाग पर असर
मोबाइल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी आंखों के लिए बेहद नुकसानदायक मानी जाती है। लगातार स्क्रीन देखने से आंखों में जलन, सूखापन, धुंधलापन और सिरदर्द जैसी दिक्कतें होने लगती हैं। इतना ही नहीं, मोबाइल का ज्यादा इस्तेमाल मानसिक स्वास्थ्य पर भी असर डालता है। सोशल मीडिया पर तुलना, नोटिफिकेशन की आदत और देर रात तक मोबाइल चलाने से तनाव, चिड़चिड़ापन और नींद की कमी हो सकती है। नींद पूरी न होने से शरीर की रिकवरी प्रभावित होती है और मानसिक थकान बढ़ जाती है।
बचाव के आसान और जरूरी उपाय
एक्सपर्ट्स के अनुसार मोबाइल का इस्तेमाल सीमित समय तक करना सबसे जरूरी है। फोन को हमेशा आंखों की सीध में रखें और झुककर देखने से बचें। हर 30–40 मिनट में ब्रेक लें और हल्की स्ट्रेचिंग करें। बैठते समय पीठ सीधी और कंधे रिलैक्स रखें। आंखों की सुरक्षा के लिए ब्लू लाइट फिल्टर या नाइट मोड का इस्तेमाल करें। सबसे जरूरी, सोने से कम से कम एक घंटा पहले मोबाइल से दूरी बना लें। छोटी-छोटी आदतें अपनाकर आप बड़ी बीमारियों से खुद को बचा सकते हैं।