8th Pay Commission पर बड़ा विवाद: पेंशन रिवीजन का साफ जिक्र गायब, पेंशनरों ने उठाए बड़े सवाल

केंद्र सरकार द्वारा 3 नवंबर 2025 को आठवें वेतन आयोग का नोटिफिकेशन जारी होने के बाद उम्मीद थी कि सरकारी कर्मचारियों और पेंशनभोगियों में खुशी की लहर दौड़ जाएगी। लेकिन इस बार जैसे ही नोटिफिकेशन सामने आया, जश्न की जगह उलझन और गहरी चिंताएँ बढ़ गईं। सवाल उठने लगे कि क्या सरकार ने करीब 69 लाख केंद्रीय पेंशनरों और फैमिली पेंशनरों को इस आयोग के दायरे से बाहर कर दिया है? यह आशंका कोई मनगढ़ंत डर नहीं, बल्कि दस्तावेजों की बारीकियों से पैदा हुआ संदेह है।

AIDEF की आपत्ति और पेंशनरों की नाराजगी

ऑल इंडिया डिफेंस एम्पलॉई फेडरेशन (AIDEF) ने तुरंत मोर्चा खोलते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण को पत्र लिखा और साफ कहा कि पेंशनरों के साथ भेदभाव बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। फेडरेशन का कहना है कि पेंशन का संशोधन बुजुर्ग कर्मचारियों का संवैधानिक अधिकार है। वे इसे किसी प्रकार की कृपा नहीं, बल्कि सेवा के बदले मिलने वाला न्याय मानते हैं। यही वजह है कि वेतन आयोग की अस्पष्टता ने पेंशनरों की चिंता बढ़ा दी है।

पेंशन रिअसेसमेंट की अनुपस्थिति बनी सबसे बड़ी परेशानी

नोटिफिकेशन की सबसे बड़ी कमी यह बताई जा रही है कि आयोग के कामकाज की शर्तों में ‘पेंशन के पुनर्मूल्यांकन’ का स्पष्ट उल्लेख नहीं है। आठवें वेतन आयोग के रिजॉल्यूशन में केवल NPS और UPS से जुड़े मुद्दों की समीक्षा की बात कही गई है। जबकि पुरानी पेंशन व्यवस्था में आने वाले लाखों पेंशनरों के लिए कोई साफ निर्देश नहीं दिखाई देता। यही अस्पष्टता पेंशनरों के लिए सबसे बड़ा खतरा मानी जा रही है, क्योंकि पिछली बार ऐसी स्थिति नहीं थी।

ग्रेच्युटी की समीक्षा, पर पुरानी पेंशन का जिक्र कमजोर

टर्म्स ऑफ रेफरेंस में पेंशन शब्द तो शामिल है, लेकिन संदर्भ बदला हुआ है। इसमें NPS और UPS वाले कर्मचारियों की ग्रेच्युटी और पेंशन लाभों की समीक्षा का आदेश दिया गया है। साथ ही, यह भी कहा गया है कि जो कर्मचारी इन दोनों स्कीमों के दायरे से बाहर हैं, उनकी पेंशन और ग्रेच्युटी को भी देखा जाएगा। लेकिन यहाँ सबसे अहम बात यह है कि ‘मौजूदा पेंशनरों’ की पेंशन बढ़ाने का ठोस आदेश दस्तावेजों से गायब है। यही तकनीकी कमी विवाद की जड़ बन गई है।

7वें वेतन आयोग से तुलना और विवाद की जड़

2014 में जब 7वें वेतन आयोग का गठन हुआ था, तब सरकार के आदेशों में साफ लिखा था कि आयोग पुरानी पेंशन पर भी विचार करेगा और पहले से रिटायर हो चुके कर्मचारियों की पेंशन की समीक्षा अनिवार्य रूप से करेगा। उसी आधार पर OROP जैसी मांगों पर फैसला हुआ था। लेकिन इस बार उस तरह की स्पष्टता नहीं है। यही वजह है कि पेंशनरों में असमंजस और गुस्सा दोनों बढ़ रहा है।

सरकार से स्पष्टीकरण की उम्मीद

फिलहाल पेंशनरों की निगाहें सरकार पर टिकी हैं। जब तक टर्म्स ऑफ रेफरेंस में संशोधन या स्पष्टीकरण नहीं आता, लाखों पेंशनरों की आशंका दूर नहीं होगी। AIDEF ने साफ संकेत दे दिया है कि जरूरत पड़ी तो बड़ा आंदोलन भी किया जा सकता है। अब गेंद पूरी तरह सरकार के पाले में है।

Rishabh Chhabra
Author: Rishabh Chhabra