बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने राज्य की राजनीति में बड़ा बदलाव ला दिया है। इस बार एनडीए रिकॉर्ड बढ़त बनाते हुए 200 से अधिक सीटें जीतता दिखाई दे रहा है, जबकि महागठबंधन 30 सीटों के आसपास सिमटता नजर आ रहा है। इन रुझानों ने साबित कर दिया कि नीतीश कुमार एक बार फिर बिहार की राजनीति के केंद्र में हैं और उनके नेतृत्व का प्रभाव मतदाताओं पर गहराई से पड़ा है।
नीतीश का नया ‘MY फार्मूला’: महिला और युवा बने जीत की कुंजी
दशकों से बिहार की राजनीति में ‘MY’ का मतलब मुस्लिम और यादव वोटबैंक से था, लेकिन इस चुनाव में नीतीश कुमार ने इसे नया अर्थ देते हुए ‘महिला + युवा’ में बदल दिया। यह रणनीति जबरदस्त तरीके से सफल रही। महिलाओं के लिए स्वरोजगार सहायता, बालिका शिक्षा, शराबबंदी और सुरक्षा योजनाओं ने उन्हें एनडीए की ओर मजबूती से आकर्षित किया। युवा मतदाताओं को रोजगार, कौशल विकास और ‘जंगलराज’ की याद दिलाकर जोड़ा गया, जिसका असर वोटों में साफ दिखा।
महिला मतदाताओं का रिकॉर्ड समर्थन
महिलाओं के लिए चलाई गई योजनाओं का सीधा लाभ एनडीए को मिला। मुख्यमंत्री स्वरोजगार योजना के तहत दी गई 10,000 रुपये की सहायता ने ग्रामीण महिलाओं में भरोसा बढ़ाया। शराबबंदी को घर-परिवार की सुरक्षा से जोड़ने वाला संदेश भी महिलाओं के बीच गहराई तक गया। इसी का परिणाम है कि महिला मतदान 62% तक पहुंच गया, जो 2020 से अधिक है और एनडीए के पक्ष में मजबूत मोड़ बना।
युवाओं पर सुशासन की छाप
युवाओं के बीच रोजगार और कानून-व्यवस्था बड़ा मुद्दा रहा। नीतीश सरकार द्वारा दी गई लाखों नौकरियां और पिछला ‘जंगलराज’ याद दिलाने वाली रणनीति ने तेजस्वी यादव के रोजगार वादे को कमजोर कर दिया। सोशल मीडिया पर चलाए गए अभियान ने भी युवा मतदाताओं को प्रभावित किया। खराब मौसम में हेलीकॉप्टर न उड़ पाने पर सड़क मार्ग से प्रचार करने से नीतीश की छवि और मजबूत हुई।
MGB का वोटबैंक खिसका, समीकरण बदले
महागठबंधन का परंपरागत मुस्लिम-यादव वोट इस बार टूट गया। कई सीटों पर यादव वोट बंटते दिखे, जबकि AIMIM की मौजूदगी ने मुस्लिम वोटों में सेंध लगा दी। तेजस्वी यादव का नारा लोकप्रिय तो हुआ, लेकिन ठोस काम की कमी और आंतरिक मतभेदों ने नुकसान पहुंचाया।
2010 जैसा जादू लौटने के संकेत
रुझान बताते हैं कि नीतीश कुमार एक बार फिर 2010 जैसी जबरदस्त जीत की ओर बढ़ रहे हैं। उनकी योजनाएं, सुशासन का मॉडल और महिला-युवा केंद्रित रणनीति इस चुनाव के निर्णायक फैक्टर साबित हुए हैं। दूसरी तरफ महागठबंधन के लिए यह नतीजे बड़ी राजनीतिक चुनौती और आत्ममंथन का समय लेकर आए हैं।