MGB की करारी हार, कांग्रेस और RJD में शुरू टकराव, संजय–कृष्णा पर उठी उंगलियां

बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने महागठबंधन (MGB) को बड़ा झटका दिया है। एनडीए 200 से अधिक सीटों पर बढ़त बनाते हुए ऐतिहासिक प्रदर्शन करता दिख रहा है, जबकि तेजस्वी यादव के नेतृत्व वाला महागठबंधन 30 सीटों के आसपास सिमटता नजर आ रहा है। तेजस्वी का ‘पढ़ाई-कमाई-दवाई’ नारा उम्मीदें जगाता तो था, लेकिन परिणामों ने साफ कर दिया कि जनता ने इस बार उन्हें पूरी तरह नकार दिया। हार का दोष अब गठबंधन के अंदर एक-दूसरे पर डाला जा रहा है और आरोपों की आग सबसे पहले तेजस्वी के सलाहकारों तक पहुंची है।

हार के बीच महागठबंधन में शुरू हुई आरोपों की लड़ाई

गठबंधन नेताओं ने मतगणना के दौरान ही हार की वजहें गिनानी शुरू कर दीं। कांग्रेस सांसद अखिलेश सिंह ने खुले तौर पर कहा कि सीट शेयरिंग में देरी और फ्रेंडली फाइट ने चुनाव बिगाड़ दिया। उनका इशारा RJD के संजय यादव और कांग्रेस के प्रभारी कृष्णा अल्लावरू की ओर था। दोनों पर आरोप है कि इन्होंने रणनीति बनाने में जल्दबाजी और गलत फैसले किए, जिससे गठबंधन की एकजुटता बुरी तरह बिखर गई। इस बयान ने MGB के भीतर गहरी खलबली मचा दी।

‘बाहरी दखल’ पर RJD नेताओं की नाराजगी

RJD के वरिष्ठ नेता अब्दुल बारी सिद्दीकी ने भी हार का ठीकरा बाहरी सलाहकारों पर फोड़ा। उन्होंने साफ कहा कि बिहार की राजनीति को समझने वाले नेता किनारे कर दिए गए और बाहर के लोगों ने चुनावी रणनीति को पटरी से उतार दिया। भले उन्होंने किसी का नाम नहीं लिया, लेकिन संकेत साफ था कि निशाना संजय यादव और कृष्णा अल्लावरू पर ही है। उनके बयान ने यह भी दिखा दिया कि महागठबंधन अंदर से कितना टूटा हुआ है।

तेजस्वी के सबसे भरोसेमंद संजय यादव पर सवाल

संजय यादव तेजस्वी यादव के सबसे करीबी रणनीतिक सलाहकार माने जाते हैं। सोशल मीडिया से लेकर टिकट वितरण तक, कई अहम फैसले उन्हीं के सुझाव पर किए जाते थे। लेकिन इस बार उन पर आरोप है कि उन्होंने सीट बंटवारे में RJD को जरूरत से ज्यादा तरजीह दी और कांग्रेस-लेफ्ट को नाराज कर दिया। कई सीटों पर हुई फ्रेंडली फाइट ने महागठबंधन के वोट काटे और यह गलतियां 10–15 सीटों पर सीधा नुकसान लेकर आईं। कांग्रेस नेताओं के मुताबिक संजय यादव ने तालमेल की जगह दबदबे की राजनीति पर जोर दिया।

कांग्रेस प्रभारी कृष्णा अल्लावरू भी निशाने पर

कांग्रेस के चुनाव प्रभारी कृष्णा अल्लावरू भी आलोचनाओं से नहीं बच पाए। पार्टी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि सीटों पर बातचीत में देरी हुई और कांग्रेस को अपेक्षा से कम सीटें मिलीं। कई अहम सीटों पर MGB एकजुट नहीं हो पाया और नतीजों ने यह कमजोरी उजागर कर दी। सवाल यह उठ रहा है कि जिस रणनीति को लेकर कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें आगे किया था, वही रणनीति अंत में महागठबंधन के लिए उलटी साबित हुई।

Rishabh Chhabra
Author: Rishabh Chhabra