Nepal में Gen-Z तूफ़ान: सोशल मीडिया बैन से भड़का आंदोलन, प्रधानमंत्री ओली ने छोड़ी गद्दी

नेपाल इस वक्त अपनी अब तक की सबसे बड़ी राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा है। सोशल मीडिया पर लगे बैन के खिलाफ शुरू हुआ Gen-Z आंदोलन इतना उग्र हो गया कि सरकार की नींव तक हिल गई। आंदोलन के दौरान 23 लोगों की मौत हो चुकी है और सैकड़ों घायल हैं। राजधानी काठमांडू सहित कई जिलों में प्रदर्शनकारियों ने संसद भवन, सुप्रीम कोर्ट और मंत्रियों के आवासों पर हमला किया। हालात बेकाबू होते देख आखिरकार प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने इस्तीफा दे दिया।

राष्ट्रपति आवास और संसद पर हमला

8 सितंबर से शुरू हुआ यह आंदोलन 9 सितंबर को और उग्र हो गया। प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति रामचंद्र पौडेल और पूर्व प्रधानमंत्रियों के घरों पर हमला बोला। भीड़ ने संसद भवन में घुसकर तोड़फोड़ की और सुरक्षा बलों की भारी तैनाती को भी धता बता दिया। नारेबाजी और आगजनी के बीच काठमांडू की सड़कों पर युवाओं की भीड़ जमा रही।

ओली का इस्तीफा और निजी आवास में आगजनी

स्थिति बिगड़ते देख ओली ने राष्ट्रपति पौडेल को भेजे अपने इस्तीफे में लिखा कि मौजूदा हालात में संवैधानिक और राजनीतिक समाधान के लिए उनका पद छोड़ना ज़रूरी है। इस्तीफे से कुछ घंटे पहले ही प्रदर्शनकारियों ने बालकोट स्थित उनके निजी आवास में आग लगा दी। यही नहीं, पूर्व प्रधानमंत्री पुष्पकमल दाहाल ‘प्रचंड’, संचार मंत्री पृथ्वी सुब्बा गुरुंग और पूर्व गृह मंत्री रमेश लेखक के घरों पर भी हमला किया गया।

छात्र बने आंदोलन की रीढ़

इस आंदोलन की खास बात यह रही कि इसमें सबसे ज़्यादा युवा और छात्र शामिल थे। कलंकी और ललितपुर जैसे इलाकों में प्रदर्शनकारियों ने टायर जलाकर सड़कें जाम कर दीं। प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक, संचार मंत्री गुरुंग के घर पर भी पथराव किया गया, क्योंकि सोशल मीडिया पर बैन लगाने का आदेश उन्होंने ही दिया था।

एक-एक कर गिरा मंत्रियों का किला

Gen-Z आंदोलन के दबाव में पहले गृह मंत्री रमेश लेखक और फिर स्वास्थ्य मंत्री प्रदीप पौडेल ने इस्तीफा दे दिया। इसके बाद ओली के खिलाफ गुस्सा और बढ़ गया। नेपाली कांग्रेस के वरिष्ठ नेताओं ने सुझाव दिया कि पार्टी सरकार से अपने मंत्री वापस बुलाए और आंदोलनकारियों से संवाद शुरू करे।

कौन संभालेगा नेपाल की सियासत?

अब सवाल है कि ओली के इस्तीफे के बाद नेपाल की सियासत कौन संभालेगा। राष्ट्रपति पौडेल ने अब तक पद नहीं छोड़ा है, जबकि सड़कों पर आंदोलनकारियों का गुस्सा थमने का नाम नहीं ले रहा। भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक अधिकारों की लड़ाई के नाम पर खड़े हुए इस आंदोलन ने यह साफ कर दिया है कि नेपाल की नई पीढ़ी अपनी आवाज दबने नहीं देगी।

सोशल मीडिया पर लगा बैन नेपाल के लिए एक सियासी सुनामी साबित हुआ, जिसने प्रधानमंत्री की कुर्सी तक हिला दी।

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Author: The Hindi Post