उत्तराखंड की खूबसूरत धराली-हर्षिल घाटी, जो एक समय पर मशहूर फिल्म ‘राम तेरी गंगा मैली’ की शूटिंग के लिए जानी गई, आज दुख और तबाही का प्रतीक बन गई है। 1985 में आई इस फिल्म ने हर्षिल को सिनेमा प्रेमियों और पर्यटकों के बीच खास पहचान दी थी। फिल्म का सुपरहिट गाना ‘हुस्न पहाड़ों का, ओ साहेबा…’ यहीं की वादियों में फिल्माया गया था लेकिन आज वही घाटी 5 अगस्त 2025 की प्राकृतिक आपदा के बाद मलबे, टूटे घरों और खामोशी से ढकी हुई है।
जब फिल्मों ने दिखाई गई थी हर्षिल की खूबसूरती
राज कपूर की इस फिल्म ने उत्तरकाशी के इस शांत और सुंदर क्षेत्र की प्राकृतिक विरासत को दुनियाभर में पहचान दिलाई थी। मंदाकिनी के किरदार ‘गंगा’ ने पहाड़ों की मासूमियत, गंगा की पवित्रता और लोगों की सादगी को बेहद भावुक अंदाज़ में पेश किया। फिल्म के कई गाने जैसे “तुझे बुलाए ये मेरी बाहें” और “हुस्न पहाड़ों का” हर्षिल, गंगोत्री और सूर्यकुंड की पृष्ठभूमि में फिल्माए गए थे।
तिलगाड़ झरने में मंदाकिनी के नहाने वाला दृश्य इतना लोकप्रिय हुआ कि लोगों ने इसे ‘मंदाकिनी फॉल’ कहना शुरू कर दिया। फिल्म की शूटिंग के बाद, हर्षिल घाटी एक टूरिस्ट हॉटस्पॉट में बदल गई, जहां हर साल हजारों लोग राज कपूर की यादों को जीने आते थे।
जहां कलाकार थे, अब वहां मातम है
अब हालात बदल गए हैं। 5 अगस्त 2025 को आई प्राकृतिक आपदा ने इस जन्नत जैसी घाटी को तहस-नहस कर दिया। नदियों का जलस्तर अचानक बढ़ा, भूस्खलन हुए, घर बह गए और कई लोगों की जान चली गई। जहां पहले कैमरे चलते थे, अब मलबा और खामोशी पसरी है।
वरिष्ठ पत्रकार शीशपाल गुंसाई कहते हैं कि “हर्षिल सिर्फ एक जगह नहीं है, वो एक भावना है। वहां गंगा की पवित्रता, हिमालय की शांति और इंसान की सादगी बसती थी। लेकिन अब ये जगह सिर्फ मोक्ष की नहीं, एक विपदा की साक्षी बन चुकी है।”
लोकल लोग आज भी याद करते हैं ‘वो दिन’
स्थानीय लोकगायक रजनीकांत सेमवाल बताते हैं कि गांववालों के लिए ‘राम तेरी गंगा मैली’ सिर्फ एक फिल्म नहीं, बल्कि गौरव और यादों का हिस्सा है। बच्चे-बूढ़े आज भी बताते हैं कि कौन-सा सीन कहां शूट हुआ था, राज कपूर जी कहां रुके थे, और कैसे मंदाकिनी को सफेद साड़ी में शूट किया गया था। आज वही लोग अपने घरों को टूटा देख रहे हैं। जो घाटी एक समय स्वर्ग लगती थी, अब वहां पीड़ा और नुकसान की कहानियां हैं।
प्रकृति का मैल या इंसानी लापरवाही?
राज कपूर की फिल्म का शीर्षक ‘राम तेरी गंगा मैली’ प्रतीकात्मक था, गंगा की पवित्रता को बचाने की पुकार, लेकिन आज हकीकत में गंगा के किनारे की धरती पर विकास और उपेक्षा का मैल दिख रहा है। धराली-हर्षिल घाटी, जिसने कभी प्रेम और शांति का संदेश दिया था, आज मानवीय दर्द और विनाश का आईना बन गई है।
जहां एक समय राज कपूर ने हर्षिल को पर्दे पर अमर किया था, वहां आज कुदरत की कड़ी मार से लोग जूझ रहे हैं। यह केवल एक भौगोलिक त्रासदी नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और भावनात्मक धक्का भी है। अब सवाल ये है- क्या हम सिर्फ फिल्मी यादों में इस घाटी को संजोएंगे या इसकी रक्षा के लिए कुछ ठोस कदम भी उठाएंगे?
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