उत्तर प्रदेश के हापुड़ जिले में स्थित मोनाड यूनिवर्सिटी पर फर्जी डिग्रियों के गोरखधंधे को लेकर एसटीएफ की छापेमारी के बाद बड़ा खुलासा हुआ है. जांच में पता चला कि यह यूनिवर्सिटी वर्षों से फर्जी डिग्री बनाकर देशभर में बेच रही थी. एसटीएफ को करीब एक माह पूर्व इस गिरोह की सूचना मिली थी, जिसके बाद छानबीन शुरू की गई.
डीएम और एसपी ने शासन से की मान्यता रद्द करने की सिफारिश
फर्जीवाड़े के खुलासे के बाद हापुड़ के डीएम अभिषेक पांडेय और एसपी ज्ञानंजय सिंह ने प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा विभाग को पत्र लिखकर यूनिवर्सिटी की मान्यता रद्द करने की सिफारिश की है. अधिकारियों का कहना है कि इस संस्थान के चलते हजारों छात्रों का भविष्य खतरे में पड़ सकता है, इसलिए तत्काल प्रभाव से सख्त कदम उठाए जाने की जरूरत है.
चेयरमैन समेत 11 आरोपी जेल में, जांच का दायरा बढ़ा
मामले में पुलिस ने यूनिवर्सिटी के चेयरमैन विजेंद्र सिंह हुड्डा समेत 11 लोगों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है. आरोप है कि विजेंद्र सिंह ने वर्ष 2020 में इस फर्जीवाड़े की शुरुआत की थी. अब एसटीएफ उन राज्यों में भी जांच कर रही है, जहां से फर्जी डिग्रियां खरीदी गई हैं. जांच के दायरे में नौ राज्य शामिल हैं.
कोविड काल से चल रहा था फर्जी डिग्री का खेल
प्रारंभिक जांच में सामने आया है कि कोविड महामारी के दौरान इस फर्जीवाड़े की नींव रखी गई थी. इस दौरान डिजिटल माध्यम से डिग्रियों की बिक्री और प्रमाण पत्रों की छपाई का खेल बड़े पैमाने पर शुरू हुआ. अब तक यूनिवर्सिटी से लगभग एक लाख फर्जी डिग्रियां जारी की जा चुकी हैं.
सरकारी नौकरियों में भी पहुंचे फर्जी डिग्रीधारी
एसटीएफ की रिपोर्ट के अनुसार, करीब 228 युवक फर्जी डिग्रियों के आधार पर सरकारी नौकरियों में कार्यरत हैं. इनमें सबसे अधिक संख्या हरियाणा, बिहार और महाराष्ट्र के युवाओं की है. वहीं, देश के अन्य हिस्सों में भी कई लोग प्राइवेट और सरकारी संस्थानों में इन डिग्रियों के जरिए नौकरी कर चुके हैं.
एजेंटों का जाल, राज्यों में फैला नेटवर्क
चेयरमैन विजेंद्र सिंह ने विभिन्न शहरों में एजेंटों के माध्यम से युवाओं को अपने जाल में फंसाया. एजेंट फर्जी डिग्रियों के बदले मोटी रकम वसूलते थे. एसटीएफ के अनुसार, देश के नौ राज्यों में मोनाड यूनिवर्सिटी का नेटवर्क सक्रिय था और यहीं सबसे ज्यादा डिग्रियां बेची गईं.
उच्च शिक्षा पर गहराया भरोसे का संकट
यह मामला केवल एक यूनिवर्सिटी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह उच्च शिक्षा प्रणाली की साख और छात्रों के भविष्य पर भी सवाल उठाता है. अब देखना यह होगा कि शासन इस मामले में क्या अंतिम निर्णय लेता है और दोषियों पर क्या सख्त कार्रवाई होती है.
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