उत्तर प्रदेश के कानपुर जिले के घाटमपुर कस्बे में स्थित मां कुष्मांडा देवी का मंदिर श्रद्धालुओं के लिए एक आस्था का केंद्र बना हुआ है। मान्यता है कि इस मंदिर में स्थापित मां कुष्मांडा देवी की पिंडी से साल भर जल रिसता रहता है, जो नेत्र विकारों को दूर करने में सक्षम है। भक्तों का कहना है कि यदि इस जल को नियमित रूप से आंखों में लगाया जाए, तो गंभीर नेत्र विकार तक ठीक हो सकते हैं। वैज्ञानिक भी इस चमत्कार पर हैरान हैं, क्योंकि अभी तक यह रहस्य अनसुलझा है कि यह जल कहां से आता है।
इतिहास और मान्यताइतिहासकारों के अनुसार, मां कुष्मांडा देवी की मूर्ति मराठा कालीन प्रतीत होती है, जो दूसरी से पांचवीं शताब्दी के बीच की मानी जाती है। यह मूर्ति दो मुखों वाली है और इसका आदि एवं अंत किसी को नहीं मिला, इसलिए इसे लेटी हुई देवी का रूप माना जाता है। मान्यता है कि इस मंदिर की खोज एक ग्वाले ने की थी, जब उसने देखा कि उसकी गाय प्रतिदिन एक स्थान पर अपना दूध गिरा रही थी। जब उस स्थान की खुदाई की गई, तो मां कुष्मांडा देवी की पिंडी प्रकट हुई। राजा घाटमपुर दर्शन ने इस स्थान पर मंदिर की स्थापना करवाई थी।
मंदिर की अनोखी परंपराभारत के अन्य मंदिरों से अलग, इस मंदिर में पूजा-अर्चना साधु-संतों के बजाय मालिन (फूल बेचने वाली) करती हैं। यह परंपरा सैकड़ों वर्षों से चली आ रही है। वर्तमान में कमला देवी इस मंदिर की पूजा-अर्चना करती हैं और मां को वस्त्र पहनाने, श्रृंगार करने और भोग लगाने का कार्य करती हैं। भक्तों का मानना है कि मां के जल से मोतियाबिंद और अन्य नेत्र रोगों में विशेष लाभ मिलता है।
विश्व में इकलौती चतुष्टय कुष्मांडा देवीइस मंदिर की देवी चतुष्टय आकार की हैं और दो मुख वाली हैं। स्थानीय श्रद्धालु राम कुमार मिश्रा के अनुसार, यह विश्व का इकलौता मंदिर है जहां इस प्रकार की मूर्ति स्थापित है। विशेषकर नवरात्रि की चतुर्थी को यहां लाखों श्रद्धालु दर्शन करने आते हैं। मां कुष्मांडा को कुम्हड़ा (कद्दू) अर्पित करने की परंपरा भी प्रचलित है, क्योंकि यह उनका प्रिय फल माना जाता है।
मां कुष्मांडा देवी का यह मंदिर अद्वितीय आस्था का केंद्र है, जहां चमत्कारी जल और चतुर्भुज आकार की देवी की मूर्ति इसे रहस्यमयी बनाती है।;