उत्तर प्रदेश के मथुरा जिले के छाता गांव में नरी सेमरी मंदिर अपनी अनोखी पूजा पद्धति के लिए प्रसिद्ध है। इस मंदिर में नवरात्रि के दौरान ढोल-नगाड़ों की गूंज सुनाई नहीं देती, बल्कि दीवारों, फर्श और मंदिर की घंटियों पर लाठियां और डंडे बजाए जाते हैं। यह परंपरा पिछले 750 वर्षों से चली आ रही है और श्रद्धालुओं की गहरी आस्था से जुड़ी हुई है।
ऐसे हुई परंपरा की शुरुआतऐसा कहा जाता है कि सिसोदिया और यधुवंशी ठाकुरों के बीच एक बार इस मंदिर की प्रतिमा को लेकर संघर्ष हुआ था। इस दौरान जबरदस्त लाठी-डंडे चले, और अंततः यधुवंशी ठाकुरों की जीत हुई। तभी से इस मंदिर में नवरात्रि के अंतिम दिन लाठियां बजाने की परंपरा शुरू हुई। ऐसा माना जाता है कि इस विशेष विधि से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और भक्तों पर अपनी कृपा बरसाती हैं।
टेढ़ी प्रतिमा और रामनवमी का विशेष महत्वमंदिर में स्थापित मां दुर्गा की प्रतिमा सालभर टेढ़ी रहती है, लेकिन रामनवमी के दिन यह सीधी हो जाती है। इसे मां की विशेष कृपा का संकेत माना जाता है, इसलिए इस दिन यहां पूजा का विशेष महत्व होता है। इस चमत्कार को देखने के लिए दूर-दूर से भक्त यहां आते हैं।
नवरात्रि में नौ देवियों की होती है पूजानवरात्रि के दौरान मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा की जाती है। ये नौ देवियां हैं—शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा, स्कंध माता, कात्यायिनी, कालरात्रि, महागौरी और सिद्धिदात्री। इस दौरान भक्त व्रत रखते हैं, माता के पंडाल सजाए जाते हैं और विशेष अनुष्ठान किए जाते हैं। मथुरा स्थित नरी सेमरी मंदिर में भक्तों की भारी भीड़ उमड़ती है, और मंदिर परिसर भक्ति भाव से सराबोर हो जाता है।
अनूठी परंपरा में श्रद्धालुओं की आस्थाइस अनोखी पूजा पद्धति के बावजूद श्रद्धालुओं की आस्था इस मंदिर से अटूट बनी हुई है। भक्तों का मानना है कि नवरात्रि के अंतिम दिन लाठियां बजाने से मां दुर्गा प्रसन्न होती हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करती हैं। यही वजह है कि हर साल यहां भक्तों का सैलाब उमड़ता है और यह मंदिर एक अनोखे धार्मिक उत्सव का गवाह बनता है।
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