संभल के दीपा सराय में बने 46 साल पुराने शिव मंदिर को प्रशासन ने खुलवा दिया है. इसके साथ ही प्रशासन द्वारा मंदिर की साफ-सफाई भी कराई गई है. दरअसल इस शिव मंदिर में साल 1978 से सांप्रदायिक तनाव के कारण ताला लटका हुआ था. उस समय संभल हिंसा की आग में दहक रहा था. इस हिंसा के दौरान 184 से अधिक लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था. संभल दंगे की कहानी पुलिस के दस्तावेजों में आज भी मौजूद है. जिसे जानकर हर किसी की रूह कांप उठेगी.
प्रबंध समिति ने अध्यक्ष ने एक शख्स को नहीं बनाया समिति का सदस्य
संभल हिंसा की जड़ एमजीएम कॉलेज से जुड़ा विवाद है. दरअसल साल 1978 में कॉलेज के संविधान में ये प्रावधान था कि कोई भी व्यक्ति या संस्था 10 हजार रुपये का दान देकर प्रबंध समिति में आजीवन सदस्य के रूप में रह सकता था. जिसके तहत स्थानीय ट्रक यूनियन की ओर से एक दूसरे समुदाय के शख्स के नाम से दस हजार रुपये का चेक कॉलेज कोष में भेजा गया था. क्योंकि इसके आधार पर ही वह शख्स प्रबंध समिति में आजीवन सदस्य होना चाहता था, परन्तु तत्कालीन उपजिलाधिकारी जोकि प्रबन्ध समिति के उपाध्यक्ष थे. उन्होंने उस शख्स को समिति का सदस्य नहीं बनाया.
छात्र-छात्राओं को टाइटल देने से नाराज थे एक समाज के लोग
इस मसले को हुए अभी कुछ ही दिन बीते थे कि होली का त्योहार शुरू हो गया. होली के मौके पर महात्मा गांधी डिग्री कॉलेज के सभी छात्र-छात्राओं को टाइटल दिये गए थे. इसमें हिंदू समाज के अलावा दूसरे समाज की लड़कियों को भी टाइटल दिए गए थे लेकिन इस टाइटल से एक समाज के लोग नाराज हो गए. वहीं जिस समाज के लोग नाराज थे उन्हें भड़काने की कोशिश उसी शख्स द्वारा की गई थी जिसने कॉलेज में 10 हजार रुपये जमा कराए थे. वहीं गुस्साए समाज के लोगों द्वारा बाजार बंद करवाने की कोशिश की गई. वहीं एक चाय वाले ने दुकान बंद करने से मना किया तो उसका सारा सामान फेंक दिया गया.
मुस्लिम शख्स की हत्या की उड़ाई गई अफवाह
वहीं इस दौरान दीपा सराय में ये अफवाह फैलाई गई कि एक मुस्लिम शख्स की हत्या कर दी गई है. जिसके बाद हिंसा भड़क उठी. हिंसा भड़कने की सूचना पर तत्कालीन उपजिलाधिकारी रमेश चन्द्र माथुर तहसीलदार कार्यालय में भाग गए. जिससे उनकी जान बच गई. वहीं बाजार में भगदड़ मच गई. गुस्साई भीड़ ने पूरी सब्जी मंडी और लगभग 40 दुकानें जो कि हिंदुओं की थीं उन्हें जला दिया और लूटपाट भी की.
कोर्ट ने मामले में 48 अभियुक्तों को किया बरी
वहीं इस दंगे के कई दिनों बाद तक जंगल से लाशें मिलने का सिलसिला जारी रहा. संभल दंगे में 184 से अधिक लोगों की मौत हो चुकी थी. इतना ही नहीं उपद्रवियों ने महिलाओं को भी नहीं बख्शा और उन्हें भी अपना शिकार बनाया. उपद्रवियों ने महिलाओं के साथ रेप किया. इस दंगे के बाद इन मृतात्माओं का अधिकतर हिंदुओं ने कपड़े का पुतला बनाकर बृजघाट में अंतिम संस्कार किया. हिंसा के बाद कई लोगों की हाथ और पैर कटे पड़े हुए मिले थे. उस पूरे भयावह मंजर को हरद्वारी लाल शर्मा और सुभाष चन्द्र रस्तोगी ने अपनी आंखों से देखा था. ये दोनों ही कोर्ट में चल रहे मुकदमे में गवाह भी रहे. कोर्
ने साल 2010 में इस मुकदमे को बंद कर दिया. वहीं सबूतों की कमी के कारण न्यायालय ने इस मामले के 48 अभियुक्त को बरी कर दिया.