लोकसभा चुनाव 2024 के नतीजों ने बसपा सुप्रीमो मायावती की नींदें उड़ा दी हैं. जिसके बाद से बसपा सुप्रीमो की बेचैनी साफ नजर आ रही है. सियासी गलियारों में भी इसकी जोर शोर से चर्चा चल रही है. इन दिनों ये सवाल सियासी गलियारों में 2 वजहों से काफी चर्चा में है. पहली वजह मायावती की तरफ से लिए गए हालिया फैसले हैं. मायावती जो कि विपक्ष में रहते हुए कभी-कभार ही उपचुनाव लड़ती थीं. उन्होंने यूपी की आगामी 10 विधानसभा सीटों पर उपचुनाव लड़ने की घोषणा कर दी है. विधानसभा की इन 10 सीटों पर नवंबर में चुनाव हो सकते हैं. इसी कड़ी में बहनजी ने एक और बड़ा फैसला खुद बीएसपी की राष्ट्रीय अध्यक्ष बन अपने भतीजे आकाश आनंद उत्तराधिकारी घोषित करने का ले लिया है. बसपा सुप्रीमो मायावती की बैचेनी पर सवाल उठने की दूसरी वजह कांग्रेस और सपा पर उनका हमलावर रवैया है. पिछले एक महीने में मायावती ने कांग्रेस और सपा के खिलाफ अपने सोशल मीडिया हैंडल से 6 पोस्ट किए हैं. जो कि बीजेपी के मुकाबले 3 गुना ज्यादा है. मायावती के इन पोस्टों में लखनऊ गेस्ट हाउस कांड और एससी-एसटी एक्ट में सबकोटा जैसे बड़े मुद्दे रहे हैं.
यूपी में खिसक गया बसपा का आधार वोट बैंक
2012 के बाद से ही मायावती किसी भी चुनाव में लीड नहीं ले पाई हैं. 2024 के चुनाव में तो बसपाटी का आधार वोटबैंक भी खिसक गया. लोकसभा के हालिया चुनाव में भी बीएसपी वोट प्रतिशत के मामले में उत्तर प्रदेश में सिंगल डिजिट में सिमट कर रह गई. देश के सबसे बड़े सूबे यूपी में पार्टी को सिर्फ 9 प्रतिशत वोट मिले. 1993 के बाद यह पहली बार है. जब यूपी में पार्टी का वोट प्रतिशत एक अंकों में सिमटा हो. यूपी में दलितों की आबादी 20 प्रतिशत के आसपास है और मायावती की पार्टी दलितों की राजनीति करती है. जिसमें 12 प्रतिशत जाटव और 8 प्रतिशत गैर-जाटव दलित हैं. खुद मायावती जाटव समुदाय से आती हैं. इस बार दलित वोट यूपी में तीन भागों में बंट गया. जाटव समुदाय का एक बड़ा हिस्सा मायावती के साथ रहा. जबकि नॉन-जाटव दलित कांग्रेस और सपा की ओर शिफ्ट कर गया. इन दोनों समुदाय का आंशिक वोट बीजेपी को भी मिला. जाटव समुदाय के तो 44 प्रतिशत वोट मायावती को मिले लेकिन नॉन जाटव के सिर्फ 15 प्रतिशत वोट बीएसपी के पक्ष में पड़े. जबकि सपा और कांग्रेस को नॉन-जाटव समुदाय का 56 प्रतिशत वोट मिल गया. वहीं इंडिया गठबंधन जाटव समुदाय में भी सेंध लगाने से नहीं चूका. इंडिया गठबंधन को जाटव समुदाय का 25 प्रतिशत वोट मिला. बीजेपी गठबंधन को नॉन जाटव समुदाय का 24 और जाटव समुदाय का 29 प्रतिशत वोट मिला. उत्तर प्रदेश में दलितों के लिए रिजर्व 17 सीटों में से बीजेपी गठबंधन को 8 और कांग्रेस गठबंधन को 9 सीटों पर जीत मिली. बीएसपी एक भी सीट नहीं जीत सकी है.
मुद्दों पर बढ़त लेने में कांग्रेस-सपा निकल गईं आगे
चाहें संविधान बदलने का मुद्दा हो, चाहें जाति आधारित जणगणना का मुद्दा हो, चाहें लेटरल एंट्री या अन्य कोई और…दलितों के बड़े मुद्दों को उठाने में कांग्रेस और सपा हमेशा बढ़त लेने में आगे रही हैं. जमीनी स्तर पर दलितों के मुद्दे को उठाने का फायदा भी दोनों पार्टियों मिला है. यूपी में बीएसपी के जो क्षेत्रीय क्षत्रप में पहले थे. अब उनमें से अधिकांश सपा या कांग्रेस में आ चुके हैं. कांग्रेस और सपा का दामन थामने वालों में इंद्रजीत सरोज, आरके चौधरी, मिठाई लाल भारती जैसे दलित नेता और रामअचल राजभर, लालजी वर्मा जैसे ओबीसी नेता शामिल हैं. बसपा के संस्थापक सदस्य और मोहनलालगंज से सपा सांसद आरके चौधरी ने हाल ही में कहा था कि बसपा पहले की तरह दलितों के मुद्दे उठाने में एक्टिव नहीं रही है. बहनजी सड़कों पर उतरना नहीं चाहती हैं. ऐसे में दलित मतदाता अपने लिए नई राह तलाश रहे हैं. यूपी में पिछले 12 साल से मायावती या उनकी पार्टी के टॉप-5 में से कोई भी नेता किसी बड़े मुद्दे पर सड़कों पर नहीं दिखाई दिए हैं.
सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने और बढ़ा दी मायावती की चिंता
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी आरक्षण में सबकोटा सिस्टम लागू करने का आदेश दे दिया है. इस आदेश के तहत एसस-एसटी की उन जातियों को आरक्षण का लाभ मिलेगा. जो क्रीमीलेयर में शामिल नहीं हैं. मायावती इसका विरोध कर रही हैं. फिलहाल केंद्र ने भी अभी इस सबकोटा सिस्टम को लागू नहीं करने की बात कही है. मगर अब तक इसे रोकने के लिए केंद्र की ओर से कोई वैधानिक उपाय भी नहीं किए गए हैं. जिसके चलते ये कहा जा रहा है कि ये मुद्दा कभी भी फिर से तूल पकड़ सकता है. जाटव समुदाय का सियासी और आर्थिक तौर पर यूपी में दबदबा माना जाता है. ऐसे में अगर क्रीमीलेयर के आधार पर दलित फूटते हैं तो इसे संभाल पाना मायावती के लिए आसान नहीं होगा. अगर ऐसा होता है तो उनके वोटबैंक में और ही ज्यादा गिरावट आ सकती है.