यूपी विधानसभा के मानसून सत्र में पेश किया गया नजूल जमीन विधेयक विधान परिषद में लटक गया है. दरअसल सीएम योगी आदित्यनाथ की अगुवाई वाली सरकार ने नजूल जमीन विधेयक पेश किया था. इस विधेयक को विधानसभा ने पास भी कर दिया लेकिन जब उप मुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य ने विधान परिषद में विधेयक पेश किया तो यह फंस गया. विधान परिषद में भाजपा प्रदेश अध्यक्ष और विधान परिषद सदस्य भूपेंद्र चौधरी ने इस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने की मांग कर दी. इस पर विधान परिषद के सभी सदस्यों ने इस विधेयक को प्रवर समिति के पास भेजने का फैसला ले लिया गया. ऐसे में ये सवाल खड़ा हो जाता कि क्या विधानपरिषद किसी विधेयक को रोक सकती है.
वित्त से जुड़े मामलों को नहीं रोक सकती विधान परिषद
जिस तरह से केंद्र में संसद के तीन अंग लोकसभा, राज्यसभा और राष्ट्रपति के समान हैं. उसी तरह उत्तर प्रदेश में विधायिका के तीन अंग हैं. विधानसभा, विधान परिषद और राज्यपाल की सहमति से ही यूपी में कोई कानून बनता है. यूपी में इन तीनों की मंजूरी कानून बनाने के लिए किसी भी विधेयक पर जरूरी होती है. वहीं यूपी विधानसभा और विधान परिषद, दोनों में भाजपा सरकार बहुमत में है. ऐसी स्थिति में सरकार की सहमति के बिना कोई भी विधेयक रुक ही नहीं सकता है.जानकारों की मानें तो विधान परिषद सामान्य दशा में वित्त से जुड़े मामलों को नहीं रोक सकती है. जैसा कि साफ है कि यूपी में विधान सभा, विधान परिषद में भाजपा को स्पष्ट बहुमत है. राज्यपाल भाजपा से हैं. ऐसे में कोई दिक्कत नहीं है.
विधान परिषद की विधायी शक्ति सीमित
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट अश्विनी कुमार दुबे बताते हैं कि साधारण विधेयक को दोनों सदनों में पुन: स्थापित किया जा सकता है लेकिन असहमति की स्थिति में विधानसभा ज्यादा प्रभावी होती है. किसी भी साधारण विधेयक को विधानपरिषद अधिकतम चार महीने तक ही रोक सकती है. वहीं केवल वित्त विधेयक को ही सिर्फ विधानसभा में पुन: स्थापित किया जा सकता है. ना ही विधानपरिषद इसको अस्वीकृत कर सकती है और ना ही 14 दिन से अधिक समय तक रोक सकती है. विधेयक को 14 दिनों के बाद परिषद से स्वतः ही पारित मान लिया जाता है. ऐसे में विधान परिषद की विधायी शक्ति सीमित है. केंद्र में राज्यसभा के पास गैर-वित्तीय विधानों को आकार देने की पर्याप्त शक्तियां हैं लेकिन विधान परिषद के पास ऐसा करने के लिए संवैधानिक शक्तियों का अभाव है. विधान परिषद द्वारा कानून निर्माण पर दिए गए सुझावों/संशोधनों का विधानसभा अध्यारोहण भी कर सकती है. मतलब कि विधानपरिषद की स्थिति काफी कमजोर है.
समिति की रिपोर्ट आने तक बिल ठंडे बस्ते में रहेगा
विधानसभा और विधान परिषद के अपने-अपने अधिकार हैं. भले ही विधान परिषद को उच्च सदन कहा जाता है लेकिन अधिकार के मामले में विधानसभा ज्यादा सम्पन्न है. अभी नजूल बिल विधान सभा से पास हुआ है. सरकार की सहमति से ही विधान परिषद में नेता सदन केशव प्रसाद मौर्य ने इस बिल को पेश किया और विधान परिषद सदस्य भूपेन्द्र चौधरी ने बिल को प्रवर समिति को भेजने की सिफारिश रख दी. प्रवर समिति को ये मामला पूरे सदन की सहमति के बाद ही भेजा गया है. अब प्रवर समिति की रिपोर्ट आने तक नजूल जमीन विधेयक ठंडे बस्ते में ही रहेगा. विधानसभा से पास इस नजूल विधेयक पर जब दो महीने के बाद प्रवर समिति की ओर से रिपोर्ट सौंपी जाएगी तो ही इस बिल पर कोई फैसला आएगा.