छुट्टियां बिताने का लेना है मजा, तो पधारो राजस्थान के इस किले में, दिखेगा गज़ब का अद्भुत नजारा, महाभारत काल से है कनेक्शन !

भारत में कई ऐसे राज्य और शहर हैं. जहां कई पर्यटक स्थल और धरोहरें हैं उन्हीं में से एक है राजस्थान का अलवर. जहां कई किले, मंदिर, ऐतिहासिक धरोहरों और राजा-महाराजाओं की बेशकीमती निशानियां मौजूद हैं. आपमें से कई लोग ऐसे भी होंगे जो इन निशानियों के बारे में शायद ही कुछ जानते हों. तो आइए आज हम आपको देश की इन प्राचीन धरोहरों से रूबरू कराते हैं.

बाला किला

सबसे पहले बात करते हैं अरावली पहाड़ पर बने बाला किला की. जिसका निर्माण काल 10वीं शताब्दी माना जाता है. ये किला मिट्टी और संगमरमर का इस्तेमाल कर तैयार किया गया है. इस किले की खूबसूरती में चार चांद लगाए हैं जालीदार खिड़कियों ने. किले में आने-जाने के लिए 6 दरवाजे बनाए गए हैं. इन दरवाजों को जय पोल, सूरज पोल, लक्ष्मण पोल, चांद पोल, कृष्ण पोल, अंधेरी गेट के नाम से जाना जाता है. ये किला बुधवार को बंद रहता है मगर बाकी दिन पर्यटक सुबह 6 बजे से शाम 4.30 बजे देख सकते हैं.

विजय मंदिर झील महल

यह खूबसूरत महल 1918 में बनाया गया था. यह महाराजा जयसिंह का आवास था. इसका ढांचा परंपरागत इमारतों से बिल्कुल अलग है. इसके अंदर एक राम मंदिर भी है. सामने से पूरी तरह दिखाई नहीं देता लेकिन इसके पीछे वाली झील से इस महल का मनोरम दृश्य देखा जा सकता है. महल को देखने के बाद झील के साथ वाले मार्ग से बाला किला पहुंचा जा सकता है.

अलवर सिटी पैलेस

अलवर सिटी पैलेस का निर्माण साल 1793 में राजपूत राजा बख्तावर सिंह ने करवाया था. सिटी पैलेस को राजपूताना और इस्लामी वास्तुकला में बनाया गया था. इस पैलेस का मुख्य आकर्षण कमल के फूलों के आकार में सुंदर मार्बल के मंडप है. यह तीन हॉल्स में विभक्त है. पहले हॉल में शाही परिधान और मिट्टी के खिलौने रखे हैं, इस हॉल का मुख्य आकर्षण महाराज जयसिंह की साईकिल है. यहां हर वस्तु बडे सुन्दर तरीके से सजाई गई है. दूसरे हॉल में मध्य एशिया के अनेक जाने-माने राजाओं के चित्र लगे हुए हैं. इस हॉल में तैमूर से लेकर औरंगजेब तक के चित्र लगे हुए हैं. तीसरे हॉल में आयुद्ध सामग्री को प्रदर्शित किया गया है. इस हॉल का मुख्य आकर्षण अकबर और जहांगीर की तलवारें हैं. यहां पर ऐसी म्यान रखी है जिसमे दो तलवारें एक साथ रखी जा सकती है यह पर्यटकों के लिए विशेष दर्शनीय है. संग्राहलय घूमने का समय सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक, शुक्रवार को यहां अवकाश रहता है.

म्यूजियम

इस म्यूजियम को देखना काफी दिलचस्प है क्योंकि इससे राजपूत राजाओं की जिंदगी को करीब से जानने-समझने का मौका मिलता है. इस में म्यूजियम में राजपूत राजाओं की जिंदगी के बारे में बहुत कुछ दिखाया गया है. पर्यटक इस म्यूजियम में मुगल बादशाह बाबर की जिंदगी से जुड़ी चीजों को देख सकते हैं, इसके अलावा ऐतिहासिक पेंटिंग, राजाओं के द्वारा उपयोग किए जाने वाले हथियार भी इस म्यूजियम में देखे जा सकते हैं.

मूसी महारानी की छतरी

राजस्थान के अलवर में सिटी पैलेस के बाहर की तरफ सागर जलाशय के पास मूसी महारानी की छतरी बनी हुई है. राजा बख्तावर सिंह और उनकी पत्नी ​​रानी मूसी की याद में विनय सिंह द्वारा बनावाई गई इस समाधि स्थल को देख सकते हैं. कहते हैं कि मूसी महारानी सती हो गई थीं. इस खूबसूरत स्मारक में राजा और रानी की कब्र स्थित है. पूरी छतरी लाल पत्थर के स्तम्भों पर टिकी हुई है. उसके ऊपर सफेद मार्बल की गुंबद व छतरी बनी हुई है. दो मंजिला यह स्मारक सूर्योदय व सूर्यास्त के दौरान अलग-अलग रूप में नजर आती है. वहीं इस छतरी के पास इसके आकर्षण को बढ़ाने के लिए एक मानव निर्मित झील का निर्माण कराया गया है.

फ़तेह जंग का मकबरा

फ़तेह जंग गुम्बद अलवर , जिसे फ़तेह जंग का गुम्बद या फ़तेह जंग का मकबरा भी कहा जाता है. भारत के राजस्थान राज्य के अलवर शहर में एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है. यह स्मारक फ़तेह जंग को समर्पित है, जो मुग़ल सम्राट शाहजहां के मंत्री थे और अलवर के गवर्नर थे, जिनकी मृत्यु 1647 में हुई. फ़तेह जंग का मकबरा वर्ष 1647 में बनाया गया था. फ़तेह जंग एक पठान योद्धा था और वह अलवर , राजस्थान के खानज़ादा शासकों से भी संबंधित था. फ़तेह जंग के मकबरे में पाँच मंज़िलें हैं , जिनमें से तीन 60 फ़ीट आकार की हैं, चौकोर आकार की हैं, और एक ही चौड़ाई की हैं. जिनमें से प्रत्येक चेहरे पर सात उद्घाटन हैं और चारों कोनों पर चार अष्टकोणीय मीनारें हैं. मकबरे का डिज़ाइन मुगल और राजपूत स्थापत्य शैली के मिश्रण को दर्शाता है.

पुरजन विहार

राजपूत राजा श्योदान सिंह ने इसका निर्माण सन 1868 में कराया था. यह एक हैरिटेज पार्क है और पूर्व में कम्पनी गार्डन के नाम से जाना जाता था अन्य स्थानों की तुलना में अधिक ठण्डा रहने के कारण, इसे महाराजा मंगल सिंह ने सन् 1885 ई. में ‘शिमला’ नाम दिया था. गर्मी के मौसम से राहत देने के लिए, यहाँ तरह तरह के पेड़ पौधे तथा फव्वारें लगाए गए हैं.

भानगढ़ का किला

भानगढ़ किला सत्रहवीं शताब्‍दी में बनवाया गया था. इस किले का निर्माण मान सिंह के छोटे भाई राजा माधो सिंह ने करावाया था. राजा माधो सिंह उस समय अकबर के सेना में जनरल के पद पर तैनात थे. उस समय भानगड़ की जनसंख्‍या तकरीबन 10,000 थी. भानगढ़ अलवर जिले में स्थित एक शानदार किला है जो कि बहुत ही विशाल आकार में तैयार किया गया है. चारों तरफ से पहाड़ों से घिरे इस किले में बेहतरीन शिल्पकलाओं का प्रयोग किया गया है. इसके अलावा इस किले में भगवान शिव, हनुमान आदी के बेहतरीन और अति प्राचिन मंदिर विध्‍यमान है. इस किले में कुल पांच द्वार हैं और साथ साथ एक मुख्‍य दीवार है. इस किले में दृण और मजबूत पत्‍थरों का प्रयोग किया गया है जो अति प्राचिन काल से अपने यथा स्थिती में पड़े हुये हैं.

गर्भाजी का झरना

गर्भाजी का झरना कई विदेशी और स्थानीय पर्यटकों को आकर्षित करता है, जो अपने मन और शरीर को ठंडा करने के लिए एक आश्रय की तलाश में हैं. चट्टानी चट्टान से गिरते पानी का आकर्षक दृश्य फोटोग्राफरों और प्रकृति प्रेमियों को आकर्षित करता है. रेगिस्तान के बीच में एक नखलिस्तान, गर्भाजी जलप्रपात अरावली नहर की गोद में अलवर के पास एक जंगल में स्थित है. झरने तक पहुंचने के लिए सीढ़ियों की एक उड़ान चढ़नी पड़ती है, जो कुछ लोगों के लिए कठिन चढ़ाई हो सकती है. फिर भी, यह पहाड़ी की चोटी के पुरस्कृत दृश्य प्रदान करता है.

सिलिसर झील

7 किलोमीटर के क्षेत्र में फैली, सिलीसेढ़ की यह आकर्षक झील राजस्थान में स्थित है और इसकी स्थापना महाराजा विनय खान ने वर्ष 1845 में की थी. पूर्व में अलवर शहर को पानी की आपूर्ति करने के लिए बनाई गई इस झील में एक आकर्षक झील महल है, जिसके बारे में कहा जाता है कि इसे महाराजा की प्रेमिका के लिए बनाया गया था. अलवर शहर से लगभग 13 किलोमीटर की दूरी पर स्थित, यह झील पिकनिक के लिए एक प्रसिद्ध स्थल है.

सरिस्का नेशनल पार्क

‘सरिस्का’ नेशनल पार्क भारत में सबसे प्रसिद्ध राष्ट्रीय उद्यानों में से एक है. यह राजस्थान के राज्य के अलवर जिले में स्थित है. इस क्षेत्र का शिकार पूर्व अलवर राज्य की शोभा थी और यह 1955 में इसे वन्यजीव आरक्षित भूमि घोषित किया गया था. 1978 में बाघ परियोजना योजना रिजर्व का दर्जा दिया गया. पार्क वर्तमान क्षेत्र 866 वर्ग किमी में फैला है. पार्क जयपुर से 107 किमी और दिल्ली से 200 किमी दूरी पर है. सरिस्का बाघ अभयारण्य में बाघ, चीत्ता, तेंदुआ, जंगली बिल्ली, कैरकल, धारीदार बिज्जू, सियार स्वर्ण, चीतल, साभर, नीलगाय, चिंकारा, चार सींग शामिल ‘मृग’ chousingha, जंगली सुअर, खरगोश, लंगूर और पक्षी प्रजातियों और सरीसृप के बहुत सारे वन्य जीव मिलते है.

मोती डूंगरी

मोती डूंगरी जयपुर , राजस्थान में भगवान गणेश को समर्पित एक हिंदू मंदिर परिसर है. इसे 1761 में सेठ जय राम पालीवाल की देखरेख में बनाया गया था. यह मंदिर शहर का एक लोकप्रिय पर्यटक आकर्षण है और बिड़ला मंदिर के बगल में स्थित है. मोती डूंगरी मंदिर राजस्थान के जयपुर में मोती डूंगरी पहाड़ी और मोती डूंगरी किले के नीचे स्थित है. मंदिर में स्थापित भगवान गणेश की मूर्ति पाँच सौ साल से भी ज़्यादा पुरानी बताई जाती है और इसे 1761 में सेठ जय राम पालीवाल द्वारा यहाँ लाया गया था जो महाराजा माधो सिंह प्रथम के साथ उदयपुर से आए थे. उन्हें गुजरात से उदयपुर लाया गया था. मंदिर का निर्माण पालीवाल की देखरेख में हुआ था.

नीमराना की बावड़ी

नीमराणा के अंदर स्थित नीमराणा की बावड़ी बहुत पुरानी और शानदार बहु-मंजिला संरचना है. यह बावड़ी नीमराना के प्रमुख पर्यटक स्थलों में से एक है, जो पर्यटकों के लिए आकर्षण का केंद्र बनी हुई है. यह बावड़ी नीमराना महल के नजदीक स्थित है जिसमे 170 चरण हैं, और जैसे-जैसे हम नीचे जाते हैं निर्माण छोटा होता जाता है. नीमराना बावड़ी पुरानी वास्तुकला की सुंदरता को दर्शाता है. जिसमे पुराने निर्माण कला की उत्कृष्टता देखी जा सकती है. नीमराणा की बावड़ी 9 मंजिला ईमारत थी और प्रत्येक मंजिल की ऊंचाई लगभग 20 फीट है. यह अंदर से ठंडा और नम है.

तिजारा की लाल मस्जिद

राजस्थान में भी मुगलिया शासन के वक्त कई मस्जिदों का निर्माण करवाया गया. इन्हीं मस्जिदों में से एक अलवर जिले के उत्तर पश्चिम स्थित तिजारा नगर में है. तिजारा नगर महाभारत में त्रिगर्त के नाम से प्रसिद्ध था. यहीं पर बनी लाल मस्जिद भी अपना महत्व रखती है. यह मस्जिद मुगल साम्राज्य के संस्थापक बाबर के पुत्र मिर्जा हिन्दाल ने बनवाई थी. बाबर ने सन् 1531 में अपने पुत्र मिर्जा हिन्दाल को अलवर एवं तिजारा का शासक घोषित किया था, लेकिन मिर्जा हिन्दाल ने 1540 तक ही अलवर व तिजारा पर शासन किया था. अपने शासन काल की अल्पावधि में ही उसने अनेक ऐतिहासिक इमारतों का निर्माण कराया था, जिसमें तिजारा की खूबसूरत लाल मस्जिद भी एक है. इस मस्जिद में बने तीनों कक्ष आपस में जुड़े हुए हैं. मस्जिद के भीतर प्रवेश करने पर समूची इमारत एक ही परिसर की भांति दिखाई देती है. इसके मुख्य कक्ष एवं उत्तरी कक्ष ऊपर से विशाल अष्टकोणीय गुम्बद से ढके दिखाई देते हैं. कहा जाता है कि दक्षिणी कक्ष का गुम्बद निर्माण कार्य में बाधा आने से रुक गया था, जिससे यह अधूरा ही रह गया और ऊपर से खुला दिखाई देता है.

जय समन्द झील 

हरी-भरी पहाडियां केवल अलवर में ही नहीं है, इसके पास के इलाकों में भी अनेक खूबसूरत झीलें और पहाडियां हैं. यहां घूमने का सबसे उपयुक्त समय मानसून है. नगर के सबसे करीब जय समन्द झील है. इसका निर्माण अलवर के महाराज जय सिंह ने 1910 में पिकनिक के लिए करवाया था. उन्होंने इस झील के बीच में एक टापू का निर्माण भी कराया था. झील के साथ वाले रोड पर केन से बने हुए घर बड़ा ही मनोरम दृश्य प्रस्तुत करते हैं. यह झील का सबसे सुन्दर नजारा है.

 

Rishabh Chhabra
Author: Rishabh Chhabra