‘ऑपरेशन विजय’ में कैसे हिंदुस्तान के वीरों ने पाकिस्तान को खदेड़ा, पढ़ें इस रिपोर्ट में

कारगिल विजय दिवस की 25वीं वर्षगांठ 26 जुलाई को है. आपको वो दिन तो याद होगा जब 25 साल पहले 26 जुलाई को कारगिल की चोटियों से पाकिस्तानी सेना को खदेड़ने का ‘ऑपरेशन विजय’ सफल हुआ था. इस ऑपरेशन ने भारतीय सेना के डिप्लॉयमेंट के तरीके से लेकर ट्रेनिंग तक सब कुछ बदल गया. इसके साथ ही उस समय तक जिस तरीके से रणनीति तैयार की जाती थी वो बदल गया.सेना अब देश के दुश्मनों से दो कदम आने रहने लगी. 26 जुलाई को देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कारगिल विजय दिवस की 25वीं वर्षगांठ पर देश के लिए जान न्यौछावर करने वाले वीर जवानों को द्रास वॉर मेमोरियल में श्रद्धांजलि देंगे.

सेना ने अपनी नई रणनीति से दुश्मनों को दी मात

‘ऑपरेशन विजय’ के दौरान भारतीय सेना को इस बात का एहसास हुआ, कि हाई ऑल्टिट्यूड और ऊंची पहाड़ियों में जंग लड़ने और जीतने के लिए रणनीति बदलनी पड़ेगी और पिछले 25 साल में रणनीति बदली भी गई. उसी का ये नतीजा रहा कि चार साल पहले 2020 में जब चीन ने ईस्टर्न लद्दाख में LAC पर धोखा देकर यथास्थिति बदलने की कोशिश की तो भारत ने उसे उसी की भाषा में जवाब दिया. पैंगोंग के उत्तरी किनारे में फिंगर एरिया में जब चीनी सैनिक काफी आगे आ गए तो भारतीय सैनिकों ने पैंगोंग के दक्षिण किनारे की ऊंची चोटियों पर कब्जा जमाकर चीन को बैकफुट पर ला दिया. फिर चीन बातचीत की टेबल पर आया. हालांकि अभी भी वहां गतिरोध खत्म नहीं हुआ है लेकिन अब बातचीत के जरिए इसे सुलझाने के लिए दोनों देश सहमत हैं और लगातार मीटिंग्स भी हो रही हैं.

नई रणनीति के हिसाब से अब होती है जवानों की ट्रेनिंग

25 साल पहले ‘ऑपरेशन विजय’ में करगिल ब्रिगेड में चार बटालियन थी. द्रास, काकसर, कारगिल और बटाला. उस वक्त तक की मिलिट्री समझ और दुनिया भर के जंग के अनुभव ये बताते थे कि अगर दुश्मन कहीं अटैक करेगा तो वो किसी महत्व के ऑब्जेक्ट पर करेगा, साथ ही उन जगहों से आएगा जहां से आने के लिए कम से कम ट्रैक तो होंगे ही. इसी नजरिए से सारी तैनाती और सारी ट्रेनिंग हो रही थी. नदी के किनारे जहां क्लास-9 रास्ते थे यानी वहां से 9 टन का वीइकल गुजर सकता था वहीं सेना की एक पूरी बटालियन यानी करीब 800 सैनिक तैनात थे. इसी तरह जहां एनिमल ट्रैक थे वहां सेना की एक कंपनी यानी करीब 100-120 सैनिक तैनात थे. जो फुट ट्रैक थे वहां एक प्लाटून यानी 30-40 सैनिक तैनात थे. इसी तरह की डिप्लॉयमेंट यानी मिरर डिप्लॉयमेंट पाकिस्तान ने भी की थी. इन ट्रैक के बीच में काफी इलाका ऐसा था जहां कोई नहीं था, जो किसी के कब्जे में नहीं था. करगिल में जब पाकिस्तानियों ने घुसपैठ शुरू की तो ये उस इलाके में की जो अछूता था. इस जंग में जीत भारत की हुई. देश ने अपने 527 जाबांजों को खोया भी लेकिन पाकिस्तानियों को खदेड़ दिया. कारगिल युद्ध के बाद यह सोच बदल गई कि दुश्मन किसी खास इलाके को ही टारगेट कर सकता है. फिर नई सोच के साथ नई रणनीति बनने लगी और उसी हिसाब से ट्रेनिंग भी शुरू हुई. तब जहां सर्दियों में ऊंचाई की पोस्ट खाली कर दी जाती थी वहीं अब सैनिक हर मौसम में डटे रहते हैं.

हाई ऑल्टिट्यूट एरिया में दी जाती है जवानों को खास ट्रेनिंग

भारतीय सेना अपने जवानों को हाई ऑल्टिट्यूट एरिया में तैनाती से पहले खास तरह की ट्रेनिंग देती है. कारगिल की जंग से पहले भी ऐसा होता रहा है लेकिन कारगिल के बाद साल 2000 में एक नए बैटल स्कूल कि स्थापना हुई. द्रास में जहां कारगिल की सबसे भीषण जंग लड़ी गई थी. इससे पहले हॉज यानी हाई ऑलटिट्यूड वॉरफेयर स्कूल ही हुआ करता था जहां ऊंची पहाड़ियों में दिन-रात हर मौसम में लड़ने की ट्रेनिंग दी जाती थी. अब भारतीय सेना के पास ऐसे दो स्कूल हो गए हैं. जहां सैनिकों को विषम परिस्थितियों में लड़ना और अपनी ज़मीन की रक्षा करने के लिए जवानों को मज़बूत किया जा रहा है. हालांकि सियाचिन में तैनाती से पहले ग्लेशियर पर भी जवानों को ट्रेनिंग दी जाती रही है. सियाचिन बैटल स्कूल में तीन हफ़्ते की कड़ी ट्रेनिंग के बाद ही सियाचिन में तैनाती दी जाती है. फ़िलहाल भारतीय सेना के पास तीन ऐसे स्कूल है HAWS, कारगिल बैटल स्कूल और सियाचिन बैटल स्कूल जहां कम ऑक्सीजन, माइनस टेंपरेचर में ऊंची पहाड़ियों पर चढ़ना और लड़ना सिखाया जाता है.

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Author: The Hindi Post