मोदी सरकार लगातार तीसरी बार सत्ता में आ चुकी है. इस बार मोदी सरकार ने कांग्रेस को आड़े हाथों लेने की ठान ली है. सरकार ने 58 साल पुराने प्रतिबंध को हटा दिया है. ये प्रतिबंध तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने लगाया था. जिसके तहत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में सरकारी कर्मचारियों के शामिल होने पर प्रतिबंध था. मगर अब मोदी सरकार ने इस आदेश को पलट दिया है. दरअसल 7 नवंबर 1966 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आरएसएस कार्यक्रमों में सरकारी कर्मचारियों के शामिल होने पर प्रतिबंध लगाने का आदेश जारी किया था. यह आदेश दिल्ली में हुए गौ-रक्षा आंदोलन के दौरान भड़की हिंसा के बाद आया था, जिसमें कई संत और गौ-भक्त मारे गए थे. इस हिंसा के बाद सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के RSS के कार्यक्रमों में शामिल ना होने का निर्णय लिया था. सरकार द्वारा लिए गए आदेश का उद्देश्य सरकारी कर्मचारियों को किसी भी सांप्रदायिक या राजनीतिक कार्यक्रमों में हिस्सा लेने से रोकना था, जिससे सरकारी तंत्र की निष्पक्षता और समर्पण बनाए रखा जा सके. जिस पर तत्कालीन सरकार का कहना था कि यह निर्णय इसलिए लिया गया ताकि सरकारी कर्मचारी किसी भी प्रकार के सांप्रदायिक संगठन की गतिविधियों से दूर रहें और सरकारी प्रशासन में निष्पक्षता और स्वच्छता बनी रहे.
”1977 में इंदिरा गांधी ने समर्थन के लिए प्रतिबंध हटाने की पेशकश की”
इस मामले में बीजेपी नेता अमित मालवीय ने कहा कि 58 साल पहले 1966 में सरकारी कर्मचारियों पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यक्रमों में हिस्सा लेने पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. इस असंवैधानिक आदेश को मोदी सरकार ने वापस ले लिया है. मूल आदेश पहले ही पारित नहीं किया जाना चाहिए था. मालवीय का कहना था कि ये प्रतिबंध इसलिए लगाया गया था, क्योंकि 7 नवंबर 1966 को संसद पर बड़े पैमाने पर गौ-हत्या विरोधी विरोध प्रदर्शन हुआ था. जिसमें आरएसएस-जनसंघ ने लाखों की संख्या में समर्थन जुटाया. पुलिस फायरिंग में कई लोग मारे गए. मालवीय ने आगे कहा कि 30 नवंबर 1966 को आरएसएस-जनसंघ के प्रभाव को देखते हुए तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने सरकारी कर्मचारियों पर आरएसएस के कार्यक्रमों में शामिल होने प्रतिबंध लगा दिया था. मालवीय का कहना था कि पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी खुद फरवरी 1977 में आरएसएस के पास पहुंचीं और अपने चुनाव अभियान के लिए समर्थन के बदले में नवंबर 1966 में लगाए गए प्रतिबंध को हटाने की पेशकश की. इसलिए, बालक बुद्धि एंड कंपनी को अंतहीन शिकायत करने से पहले कांग्रेस का इतिहास जानना चाहिए.
”सरकारी दफ्तरों पर RSS का कब्ज़ा कर संविधान से करेंगे छेड़छाड़”
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने कहा कि ”1947 में आज ही के दिन भारत ने अपना राष्ट्रीय ध्वज अपनाया था. RSS ने तिरंगे का विरोध किया था और सरदार पटेल ने उन्हें इसके खिलाफ चेतावनी दी थी. 4 फरवरी 1948 को गांधी जी की हत्या के बाद सरदार पटेल ने RSS पर प्रतिबंध लगा दिया था. मोदी जी ने 58 साल बाद, सरकारी कर्मचारियों पर RSS की गतिविधियों में शामिल होने पर 1966 में लगा प्रतिबंध हटा दिया है. हम जानते हैं कि पिछले 10 वर्षों में भाजपा ने सभी संवैधानिक और स्वायत्त संस्थानों पर संस्थागत रूप से कब्ज़ा करने के लिए RSS का उपयोग किया है. मोदी जी सरकारी कर्मचारियों पर RSS की गतिविधियों में शामिल होने पर लगा प्रतिबंध हटा कर सरकारी दफ़्तरों के कर्मचारियों को विचारधारा के आधार पर विभाजित करना चाहते हैं. यह सरकारी दफ़्तरों में लोक सेवकों के निष्पक्षता और संविधान के सर्वोच्चता के भाव के लिए चुनौती होगा. सरकार संभवतः ऐसे कदम इसलिए उठा रही है क्योंकि जनता ने उसके संविधान में फेर-बदल करने की कुत्सित मंशा को चुनाव में परास्त कर दिया. चुनाव जीत कर संविधान नहीं बदल पा रहे तो अब पिछले दरवाजे सरकारी दफ्तरों पर RSS का कब्ज़ा कर संविधान से छेड़छाड़ करेंगे. यह RSS द्वारा सरदार पटेल को दी गई उस माफ़ीनामा व आश्वासन का भी उल्लंघन है जिसमें उन्होंने RSS को संविधान के अनुरूप, बिना किसी राजनीतिक एजेंडे के एक सामाजिक संस्था के रूप में काम करने का वादा किया था. विपक्ष को लोकतंत्र और संविधान की रक्षा के लिये आगे भी संघर्ष करते रहना होगा.”
7 नवंबर 1966 को प्रदर्शनकारियों ने किया था संसद का घेराव
1966 में 7 नवंबर को संसद के घेराव का मुख्य कारण गौ रक्षा के लिए राष्ट्रीय स्तर पर गाय की हत्या पर प्रतिबंध लगाने की मांग थी. इस आंदोलन का आयोजन सर्वदलीय गौ-रक्षा महासमिति द्वारा किया गया था, जिसमें कई हिंदू संगठन और साधु संत शामिल थे. इस आंदोलन में करीब 125,000 लोग शामिल हुए थे, जिन्होंने दिल्ली की सड़कों पर विरोध प्रदर्शन किया. आंदोलन के दौरान हिंसा भड़क उठी, जिसके चलते पुलिस ने आंसू गैस, लाठीचार्ज और गोलीबारी का सहारा लिया. इस घटना में एक पुलिसकर्मी और सात आंदोलनकारी मारे गए थे. इसके चलते तत्कालीन गृह मंत्री गुलजारीलाल नंदा को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था. यह विरोध-प्रदर्शन केएन गोविंदाचार्य के गोरक्षा आंदोलन समेत उत्तर भारत के कई हिंदुत्व और गौरक्षा समर्थक संगठनों द्वारा आयोजित किया गया था. इस आयोजन को विश्व हिन्दू परिषद (विहिप) ने भी समर्थन दिया था.